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राजस्थानी सिनेमा की वो 5 ख़ूबसूरत और क्लासिक फिल्में, जिन्होंने रचा यादगार इतिहास

Rajasthani Cinema Golden Era: अपनी धरती और अपनी भाषा का सिनेमा। राजस्थानी सिनेमा की यात्रा सिर्फ फिल्मों की कहानी नहीं, बल्कि भाषा, लोक संस्कृति और बदलते समाज की तस्वीर भी है। नज़राना से लेकर बाई चली सासरिये तक, इन फिल्मों ने क्षेत्रीय सिनेमा की पहचान मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
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भारत

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MI Zahir

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एम आई ज़ाहिर

Aug 24, 2026

Rajasthani Cinema News.

रणबंकों की वीरभूमि राजस्थान के राजस्थानी सिनेमा का सुनहरा काल। ( फोटो: AI.)

सिनेमा का मतलब केवल बॉलीवुड, हॉलीवुड या साउथ का सिनेमा नहीं है। राजस्थानी सिनेमा भी है। धोरों की धरती राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा राजस्थानी सिनेमा है। करीब आठ दशक से ज्यादा लंबी इस यात्रा में कई ऐसी फिल्में बनीं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद राजस्थानी भाषा, लोकजीवन और संस्कृति को पर्दे पर जीवंत रखा। मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में फिल्म विकास निगम जैसी संस्थागत मदद का मजबूत ढांचा नहीं रहा। ये फिल्में केवल कभी-कभी टैक्स फ्री होने से इस इंडस्ट्री को सरकार से अधिक मदद नहीं मिली। ऐसे में राजस्थानी फिल्मकारों का जज़्बा, मेहनत और अपनी माटी से जुड़ाव ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने अपने दिल, जिगर और कलेजे के दम पर सुविधाओं के अभाव के बीच राजस्थानी सिनेमा के नाम पर सेल्युलॉयड पर एक यादगार इतिहास रच दिया।

इन फिल्मों ने अलग-अलग दौर में अमिट छाप छोड़ी

अहम बात यह है कि राजस्थानी फिल्मों का इतिहास 1942 की ‘नज़राना’ से जोड़ा जाता है। इसके बाद ‘बाबासा री लाडली’, ‘बाबा रामदेव’, ‘म्हारी प्यारी चनणा’ और ‘बाई चली सासरिये’ जैसी फिल्मों ने अलग-अलग दौर में अमिट छाप छोड़ी। उपलब्ध फिल्म-संदर्भों में ‘नज़राना’ को पहली राजस्थानी फिल्म और ‘बाबासा री लाडली’ को पहली बड़ी हिट के तौर पर दर्ज किया गया है।

ऐतिहासिक महत्व, लोकप्रियता और राजस्थानी सिनेमा पर प्रभाव

एक बात बता दें कि यहां चुनी गई पांच फिल्में केवल मनोरंजन के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक महत्व, लोकप्रियता और राजस्थानी सिनेमा पर उनके प्रभाव को ध्यान में रखकर शामिल की गई हैं।

  1. नज़राना (1942): जहां से शुरू हुआ सफर

राजस्थानी सिनेमा की चर्चा हो और ‘नज़राना’ का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। सन 1942 में रिलीज हुई इस फिल्म को राजस्थानी भाषा में बनी पहली फिल्म माना गया गया है। फिल्म का निर्देशन जी. पी. कपूर ने किया था और इसमें धार्मिक फिल्मों के लिए मशहूर जोधपुर मूल के अभिनेता महीपाल (महीपाल भंडारी) प्रमुख भूमिका में थे। इन पंक्तियों के लेखक को उनसे बार-बार मिलने और इंटरव्यू लेने का सौभाग्य भी मिला है, वे कवि भी थे और कवि सम्मेलनों में सम्मिलित होते थे।

राजस्थानी फिल्मकारों के लिए रास्ता तैयार किया

‘नज़राना’ का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह पहली फिल्म थी। इसका असली महत्व इस बात में है कि उस दौर में क्षेत्रीय भाषा में फिल्म बनाने की कोशिश की गई, जब भारतीय फिल्म उद्योग अभी अपने शुरुआती विस्तार के दौर में था। इतिहास में इसकी जगह बेहद महत्वपूर्ण है। यह राजस्थानी सिनेमा की वह पहली कड़ी है, जिसने आगे आने वाले फिल्मकारों के लिए रास्ता तैयार किया।

  1. बाबासा री लाडली (1961): पहली बड़ी हिट की पहचान

सन 1942 के बाद राजस्थानी सिनेमा को अगली बड़ी पहचान सन 1961 में ‘बाबासा री लाडली’ से मिली। इसे उपलब्ध संदर्भों में दूसरी राजस्थानी फिल्म और पहली बड़ी हिट के रूप में दर्ज किया गया है।

फिल्म का निर्माण बी. के. आदर्श की आदर्श फिल्म्स के बैनर तले हुआ। भारतीय सिनेमा के विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ Encyclopaedia of Indian Cinema में इसे ‘नज़राना’ के बाद दूसरी राजस्थानी फिल्म और पहली हिट बताया गया है।

राजस्थानी सिनेमा में रंगीन गीतों की शुरुआत

इस फिल्म की खासियत सिर्फ इसकी लोकप्रियता नहीं थी। इसे राजस्थानी सिनेमा में रंगीन गीतों के शुरुआती महत्वपूर्ण प्रयोग से भी जोड़ा जाता है। यही वजह है कि यह फिल्म राजस्थानी सिनेमा के विकासक्रम में एक अहम पड़ाव मानी जाती है।

  1. म्हारी प्यारी चनणा (1983): सिल्वर जुबली का मुकाम

सन 1980 के दशक में राजस्थानी सिनेमा ने दर्शकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। इसी दौर की चर्चित फिल्म है ‘म्हारी प्यारी चनणा’, जो 1983 में आई।

फिल्म के निर्माता और निर्देशक जतीनकुमार अग्रवाल थे और इसे राजस्थानी सिनेमा की पहली सिल्वर जुबली फिल्म के रूप में दर्ज किया जाता है। सिल्वर जुबली का अर्थ है कि फिल्म ने सिनेमाघरों में 25 सप्ताह पूरे किए।

लंबे समय तक सिनेमाघरों में बनी रही

यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि क्षेत्रीय फिल्मों के सामने हमेशा सीमित बजट, वितरण और प्रचार जैसी चुनौतियां रही हैं। ऐसे में लंबे समय तक सिनेमाघरों में बने रहना दर्शकों की मजबूत रुचि का संकेत था।

‘म्हारी प्यारी चनणा’ इस बात का उदाहरण बनी कि राजस्थानी भाषा की फिल्म भी लंबे समय तक दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सकती है।

  1. बाई चली सासरिये (1988): लोकप्रियता का नया दौर

यह हमारे सामने की बात है। सन 1988 में आई ‘बाई चली सासरिये’ राजस्थानी सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्म मानी जाती है। फिल्म का निर्देशन मोहन सिंह राठौड़ और निर्माण भरत नाहटा ने किया था। फिल्म में जगदीप, ललिता पवार और नीलू वाघेला सहित कई कलाकारों ने अदाकारी की थी।

यह फिल्म 100 दिनों तक सिनेमाघरों में चली

इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका 100 दिनों तक सिनेमाघरों में चलना रही। उपलब्ध संदर्भ इसे राजस्थानी सिनेमा में ऐतिहासिक सफलता से जोड़ते हैं। बाद में इस फिल्म को राजस्थानी भाषा की फिल्मों में रुचि जगाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में भी याद किया गया।

‘बाई चली सासरिये’ की सफलता यह बताती है कि स्थानीय भाषा, सामाजिक परिवेश और मनोरंजन को जोड़कर बनाई गई फिल्म बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच सकती है।

  1. बाबा रामदेव (1963): लोक आस्था और सिनेमा का मेल

राजस्थान में लोकदेवताओं और लोक आस्था का सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। ऐसे विषयों का सिनेमा में आना क्षेत्रीय फिल्मों के लिए स्वाभाविक विस्तार था। ‘बाबा रामदेव’ फिल्म इसी परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। जैसलमेर के रामदेवरा में बाबा रामदेव का मंदिर है और यहां देश भर से भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं। सन 1963 में आई ‘बाबा रामदेव’ राजस्थानी फिल्मों के शुरुआती दौर की महत्वपूर्ण फिल्म है।

स्थानीय पहचान को पर्दे पर जगह दी

फिल्म-सूचियों में इसे उस दौर की प्रमुख राजस्थानी फिल्मों के साथ दर्ज किया गया है। इस तरह की फिल्मों ने राजस्थानी सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि लोकविश्वास, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं और स्थानीय पहचान को पर्दे पर जगह दी।

इन पांच फिल्मों में दिखती है राजस्थानी सिनेमा की पूरी यात्रा

अगर इन पांच फिल्मों को एक साथ देखा जाए तो राजस्थानी सिनेमा की यात्रा की कई महत्वपूर्ण तस्वीरें सामने आती हैं।

•‘नज़राना’ शुरुआत का प्रतीक है।
•‘बाबासा री लाडली’ लोकप्रियता की पहली बड़ी उपलब्धि को सामने रखती है।
•‘बाबा रामदेव’ लोक आस्था और सिनेमा के रिश्ते को दिखाती है।
•‘म्हारी प्यारी चनणा’ लंबे समय तक दर्शकों से जुड़े रहने की क्षमता का उदाहरण है।
•‘बाई चली सासरिये’ व्यावसायिक लोकप्रियता के मजबूत दौर की तस्वीर पेश करती है।

यही वजह है कि इन फिल्मों को केवल पुरानी फिल्में कहकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। ये राजस्थान की भाषाई और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं।

राजस्थानी सिनेमा: राजस्थान की जमीन राजस्थान का आसमान- रंग रंगीलो राजस्थान

फिल्मखासियतवर्ष
नज़रानापहली राजस्थानी फिल्म1942
बाबासा री लाडलीपहली बड़ी हिट1961
बाबा रामदेवलोक आस्था की कहानी1963
म्हारी प्यारी चनणासिल्वर जुबली उपलब्धि1983
बाई चली सासरिये100 दिन चली1988
नज़रानासिनेमा की शुरुआत1942
बाबासा री लाडलीरंगीन गीतों की पहचान1961
बाबा रामदेवसांस्कृतिक विरासत1963
म्हारी प्यारी चनणादर्शकों की पसंद1983
बाई चली सासरियेसुनहरा दौर1988

युवा दर्शकों के लिए क्यों जरूरी है यह वॉचलिस्ट?

आज का युवा दर्शक हिंदी, दक्षिण भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के साथ क्षेत्रीय फिल्मों को भी तेजी से देख रहा है। ऐसे समय में राजस्थानी सिनेमा की पुरानी फिल्मों को देखना अपनी स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को नए नजरिये से समझने का अवसर देता है।

लोकविश्वास, संगीत और पारिवारिक जीवन की झलक

इन फिल्मों में उस समय की भाषा, पहनावा, सामाजिक रिश्ते, लोकविश्वास, संगीत और पारिवारिक जीवन की झलक मिलती है। यानी ये फिल्में अपने दौर के समाज का एक तरह का दृश्य दस्तावेज भी हैं।

हालांकि पुरानी फिल्मों को आज के नजरिये से देखते समय उनके दौर और सामाजिक संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है। यही नजरिया उन्हें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन का विषय भी बनाता है।

राजस्थानी सिनेमा के इतिहास के लिए अभी भी व्यापक शोध और दस्तावेजीकरण की जरूरत है। कई पुरानी फिल्मों की उपलब्धता सीमित है और कुछ फिल्मों के प्रिंट या डिजिटल संस्करण आसानी से नहीं मिलते। इसलिए इन फिल्मों की जानकारी जुटाना भी अपने आप में एक सांस्कृतिक संरक्षण का काम है।

इसकी सांस्कृतिक यात्रा बेहद समृद्ध

राजस्थानी सिनेमा का इतिहास संख्या में भले छोटा दिखाई दे, लेकिन इसकी सांस्कृतिक यात्रा बेहद समृद्ध है। 1942 की ‘नज़राना’ से शुरू हुआ यह सफर अलग-अलग दौर से गुजरता हुआ आज तक पहुंचा है।

राजस्थान के क्षेत्रीय सिनेमा की शुरुआत

बहरहाल,इन पांच फिल्मों को एक वॉचलिस्ट की तरह देखा जाए तो 'राजस्थान के क्षेत्रीय सिनेमा की शुरुआत, उसकी लोकप्रियता, लोक संस्कृति और व्यावसायिक संघर्ष' चारों पहलुओं को समझने का मौका मिलता है। युवा दर्शकों के लिए ये फिल्में सिर्फ पुरानी यादें नहीं हैं। ये उस राजस्थान को पर्दे पर देखने का अवसर हैं, जिसे गीत, बोली, लोककथा और सामाजिक जीवन ने मिलकर गढ़ा है। अगर आज का दर्शक सिनेमाघर में टिकट खरीद कर यह सिनेमा देखे तो इसकी हालत बेहतर हो सकती है।