
जूडो में राजस्थान का डंका (AI)
राजस्थान की पहचान हमेशा से शौर्य, साहस और जुझारूपन की भूमि के रूप में रही है। पारंपरिक रूप से जहां राजस्थान की माटी कुश्ती, तीरंदाजी और घुड़सवारी जैसे खेलों से पहचानी जाती थी, वहीं आज राज्य के युवा आधुनिक मार्शल आर्ट्स विशेषकर जूडो (Judo) में पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।
हाल के वर्षों में राजस्थान के जूडो परिदृश्य में एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिली है। कस्बों और गांवों से निकलकर खिलाड़ी अब न केवल राज्य स्तरीय बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय तातामी (जूडो मैट) पर अपनी तकनीकी श्रेष्ठता और मानसिक दृढ़ता का लोहा मनवा रहे हैं। कोलकाता से लेकर दिल्ली और हैदराबाद तक, राजस्थान के जूडोकाओं का दबदबा यह साबित कर रहा है कि यदि प्रतिभा को सही दिशा और हौसला मिले, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
राजस्थान के जूडो इतिहास में हालिया समय स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में कोलकाता में आयोजित जूनियर नेशनल जूडो चैंपियनशिप में देखने को मिला, जहां राजस्थान की पुरुष टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ओवरऑल टीम चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। देश के दिग्गज राज्यों को पछाड़कर यह खिताब जीतना राज्य के खेल ढांचे और युवा खिलाड़ियों के कड़े अभ्यास का प्रत्यक्ष परिणाम है। इसके साथ ही, दिल्ली में आयोजित सीनियर राष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिता में भी राजस्थान का परचम शान से लहराया।
मोनिका चौधरी: 48 किलोग्राम भार वर्ग में अपने तेज आक्रमण और सटीक तकनीक के दम पर स्वर्ण पदक (Gold Medal) जीतकर प्रदेश का नाम रोशन किया।
हिमांशु चौधरी: 60 किलोग्राम भार वर्ग में कड़े मुकाबले के बाद रजत पदक (Silver Medal) जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की।
सीनियर वर्ग में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतना यह दर्शाता है कि राज्य के खिलाड़ी अब केवल भाग लेने नहीं, बल्कि पोडियम पर शीर्ष स्थान हासिल करने के इरादे से उतरते हैं।
किसी भी खेल की मजबूती उसकी जड़ों में होती है। राजस्थान में जूडो केवल जयपुर या बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे जिलों और कस्बों में इसका आधार बेहद मजबूत हुआ है।
राजस्थान जैसे पारंपरिक समाज में खेल के मैदान पर बेटियों की बढ़ती भागीदारी एक सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। जूडो जैसे शारीरिक और तकनीकी खेल में लड़कियों का आगे आना न केवल आत्मरक्षा (Self-Defense) के प्रति जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि उन्हें एक सशक्त पहचान भी दे रहा है।
मोनिका चौधरी और अपनी सिंह जैसी खिलाड़ी आज राज्य की हजारों बालिकाओं के लिए रोल मॉडल बन चुकी हैं। स्कूल और सब-जूनियर स्तर पर लड़कियों के वर्ग में मिलने वाले पदकों की संख्या यह दर्शाती है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की महिला जूडोका भारत का गौरव बढ़ाएंगी।
खिलाड़ियों की मेहनत को मंच तभी मिलता है जब खेल संघ पारदर्शी और सक्रिय हों। राजस्थान स्टेट जूडो एसोसिएशन (RSJA), अध्यक्ष श्री हरीश चंद्र शर्मा और महासचिव महिपाल ग्रेवाल के नेतृत्व में, राज्य में खेल के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
पारदर्शी चयन प्रक्रिया: भीलवाड़ा और अन्य जिलों में समय-समय पर सीनियर और जूनियर ओपन चयन ट्रायल्स का आयोजन किया जा रहा है, जिससे दूर-दराज के प्रतिभावान खिलाड़ियों को भी बिना किसी भेदभाव के राष्ट्रीय टीम में जगह मिल रही है।
नियमित प्रतियोगिताएं: राज्य भर में नियमित प्रतियोगिताओं के आयोजन से खिलाड़ियों को मैच-टेंपरामेंट और दबाव में खेलने का अनुभव मिल रहा है।
राजस्थान के अधिकांश जूडो खिलाड़ी मध्यमवर्गीय या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। इनके रास्ते में चुनौतियां कम नहीं थीं:
राजस्थान के इन जूडो चैंपियंस का सफर हर उस युवा के लिए एक रोडमैप है जो खेल में अपना करियर बनाना चाहता है।
राजस्थान में जूडो का भविष्य बेहद उज्ज्वल है, लेकिन इस गति को बनाए रखने के लिए कुछ ठोस कदमों की आवश्यकता है।
राजस्थान के जूडो खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि "हौसलों के तरकश में जब मेहनत का तीर होता है, तो हर मुकाबला फतह होता है।" कोलकाता में टीम चैंपियनशिप की ट्रॉफी हो या दिल्ली में चमचमाते पदक, यह केवल शुरुआत है। यदि इसी तरह खिलाड़ियों का जज्बा, कोचों की लगन और एसोसिएशन का समर्थन जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब ओलंपिक के पोडियम पर राजस्थान का कोई लाल या लाडली तिरंगा लहराते हुए नजर आएंगे।
Updated on:
22 Aug 2026 01:58 pm
Published on:
22 Aug 2026 01:58 pm
