
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात पर बढ़ता दबाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए नई चुनौती बन रहा है। ( फोटो : ChatGPT.)
ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दबाव अभियान अब केवल आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं रह गया है। अगस्त के अंत और सितंबर 2026 की शुरुआत में अमेरिका-ईरान तनाव फिर सैन्य और समुद्री मोर्चे पर बढ़ा है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने के साथ होर्मुज़ जलडमरूमध्य में नौवहन को नियंत्रित करने और वाणिज्यिक जहाज़ों की आवाजाही सुरक्षित रखने पर भी जोर दिया है।
ट्रंप प्रशासन की मौजूदा रणनीति को उनकी पहली सरकार के दौरान अपनाई गई ‘अधिकतम दबाव’ नीति का अधिक कठोर संस्करण माना जा रहा है। इसका मूल उद्देश्य ईरान की तेल आय, वित्तीय नेटवर्क और रणनीतिक क्षमता पर दबाव बढ़ाकर तेहरान को अमेरिकी शर्तों पर बातचीत के लिए मजबूर करना है।
हालिया घटनाक्रम में यह दबाव समुद्री मार्गों तक पहुंच गया है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई ने जुलाई के मध्य से ईरान के कच्चे तेल के निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। रॉयटर्स के अनुसार ईरान के कच्चे तेल की लोडिंग मार्च में करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर अगस्त में लगभग 2.20–2.55 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई।
इसे ईरान की पूरी समुद्री सीमा की पारंपरिक नाकेबंदी कहना सटीक नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी कार्रवाई का मुख्य असर खाड़ी, ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जुड़े समुद्री आवागमन पर पड़ा है।
ईरान के लिए तेल निर्यात विदेशी मुद्रा आय का प्रमुख स्रोत है। निर्यात में तेज गिरावट से तेहरान की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर सरकारी राजस्व, मुद्रा विनिमय दर, महंगाई और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी तेल का सबसे बड़ा प्रमुख खरीदार चीन है और समुद्री आवाजाही बाधित होने से ईरानी तेल के भंडारण और टैंकर उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ रहा है।
यानी अमेरिकी रणनीति का निशाना केवल ईरान के परमाणु या सैन्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक क्षमता को लंबे समय तक कमजोर करना भी है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार 2025 की पहली छमाही में इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 20.9 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरे थे। इसी अवधि में करीब 11.7 अरब घन फुट प्रतिदिन एलएनजी भी इस मार्ग से गुजरी।
सन 2026 की दूसरी तिमाही में संघर्ष के बीच होर्मुज़ से तेल प्रवाह औसतन केवल 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि 2025 की चौथी तिमाही में यह 21.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। एलएनजी प्रवाह भी 2026 की दूसरी तिमाही में घट कर करीब 0.8 अरब घन फुट प्रतिदिन रह गया।
यही वजह है कि होर्मुज़ में किसी भी लंबे व्यवधान का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया के बड़े ऊर्जा आयातक, खासकर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया, इस मार्ग पर निर्भर हैं।
समुद्री मार्ग में जहाज़ों की संख्या घटने से तेल और गैस की आपूर्ति पर अनिश्चितता बढ़ती है। ईआईए के अनुसार जुलाई में होर्मुज़ से जुड़े हमलों और व्यवधानों के बाद ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 23 जुलाई को 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।
सितंबर की शुरुआत में भी जहाज़ों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे रही। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार को केवल चार कमोडिटी जहाज़ों ने होर्मुज़ पार किया, जबकि पिछले 10 दिनों का औसत करीब 13 जहाज़ प्रतिदिन था।
अमेरिकी रणनीति ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर उसे समझौते की ओर लाने की कोशिश है, लेकिन समुद्री दबाव के साथ सैन्य टकराव का जोखिम भी बढ़ गया है। सितंबर की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच फिर हमले हुए और होर्मुज़ में तनाव बढ़ा।
इसका सबसे बड़ा सवाल यही है कि आर्थिक दबाव तेहरान को बातचीत की मेज पर लाता है या संघर्ष को और लंबा करता है। यदि होर्मुज़ में समुद्री यातायात लंबे समय तक बाधित रहता है, तो ऊर्जा कीमतों, बीमा लागत, माल ढुलाई और एशियाई आयातकों के लिए आपूर्ति सुरक्षा पर इसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस हो सकता है।
Updated on:
02 Sept 2026 09:11 pm
Published on:
02 Sept 2026 07:23 pm
