
US India Agricultural Trade Deal : अमेरिका भारत के कृषि समझौते से क्यों चिंतित हैं किसान, PC- Chatgpt
अमेरिका और भारत के बीच नए व्यापार समझौते के बाद भारतीय कृषि को लेकर बहस तेज है। सरकार इसे किसानों के लिए नए निर्यात अवसरों का दरवाजा बता रही है, तो किसान संगठनों को डर है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों की बढ़ती पहुंच से घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सवाल है...इस समझौते से भारतीय किसानों को वास्तव में क्या मिलेगा और उनके सामने कौन-सी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं?
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में हुए अंतरिम व्यापार समझौते ने कृषि क्षेत्र को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े कृषि बाजारों में से एक है और भारतीय कृषि उत्पादों के लिए भी यहां बड़ी संभावनाएं हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी कृषि उत्पादन का पैमाना बहुत बड़ा है और वहां की खेती में आधुनिक तकनीक, बड़े खेत, मशीनरी और व्यापक सरकारी समर्थन का इस्तेमाल होता है। ऐसे में भारतीय किसानों के लिए यह समझौता अवसर भी है और चुनौती भी।
7 फरवरी 2026 को भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापार समझौते के लिए ढांचे की घोषणा की। इसका मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाना और भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच बनाना है।
इस व्यवस्था के तहत अमेरिका ने कई भारतीय उत्पादों पर शुल्क कम करने की बात कही। लेकिन कृषि क्षेत्र में सभी उत्पादों के लिए एक जैसी व्यवस्था नहीं है। सरकार के मुताबिक करीब 1.36 अरब डॉलर के भारतीय कृषि निर्यात को अमेरिका में शून्य अतिरिक्त शुल्क का फायदा मिलेगा।
यानी इसे सिर्फ कृषि समझौता कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह व्यापक व्यापार समझौते का हिस्सा है, जिसमें कृषि से जुड़े कुछ उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिली है, जबकि भारत ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की कोशिश की है।
भारतीय किसानों के लिए इस समझौते का सबसे बड़ा संभावित फायदा निर्यात बाजार के विस्तार के रूप में सामने आता है। सरकार के अनुसार मसाले, चाय, कॉफी, काजू और अन्य मेवे, नारियल उत्पाद, एवोकाडो, केला, अमरूद, आम, कीवी, पपीता, अनानास, मशरूम, तिल और कुछ प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को अमेरिकी बाजार में अतिरिक्त शुल्क से राहत मिली है।
भारत में लाखों किसान इन फसलों से जुड़े हैं। अगर अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ती है तो निर्यातक कंपनियां ज्यादा खरीद कर सकती हैं। इससे किसानों को स्थानीय बाजार के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार का विकल्प मिल सकता है।
खासकर मसाला किसानों के लिए यह महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत दुनिया के प्रमुख मसाला उत्पादक देशों में है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के किसान जीरा, धनिया, मिर्च, हल्दी और अन्य मसालों की खेती करते हैं। अमेरिकी बाजार में शुल्क कम होने से इन उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर हो सकती है।
सिर्फ शुल्क घटने से किसान की आय अपने आप नहीं बढ़ेगी। किसानों को बेहतर कीमत तभी मिलेगी जब निर्यात की बढ़ी मांग का असर खरीद कीमतों पर पड़े और बीच की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में किसान का हिस्सा बढ़े।
भारत के लिए केवल कच्ची कृषि उपज का निर्यात ही अवसर नहीं है। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में इससे कहीं ज्यादा संभावनाएं हैं। उदाहरण के लिए आम को केवल ताजा फल के रूप में अमेरिका भेजने के बजाय उसका गूदा, जूस, पल्प या अन्य खाद्य उत्पाद बनाकर निर्यात किया जाए तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ सकती है। इसी तरह टमाटर, फल, मसाले और दूसरे उत्पादों में प्रसंस्करण उद्योग बढ़ने से किसानों को स्थानीय स्तर पर भी बाजार मिल सकता है। इसलिए समझौते का वास्तविक फायदा 'ज्यादा निर्यात' से ज्यादा 'ज्यादा मूल्य वाले निर्यात' में छिपा है।
भारत का कपड़ा उद्योग अमेरिका के बड़े बाजारों में निर्यात करता है। अगर व्यापार समझौते से भारतीय कपड़ा और परिधान निर्यात को बढ़ावा मिलता है तो कपास की मांग बढ़ सकती है। इसका अप्रत्यक्ष फायदा कपास किसानों को मिल सकता है। ज्यादा कपड़ा उत्पादन का मतलब कच्चे माल की जरूरत बढ़ना है।हालांकि यह फायदा तत्काल नहीं होगा। इसके लिए कपड़ा उद्योग का विस्तार, निर्यात में वृद्धि और कपास की स्थिर मांग जरूरी होगी।
यहीं से समझौते का दूसरा पहलू सामने आता है। किसान संगठनों को चिंता है कि व्यापार समझौतों के जरिए भविष्य में अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार ज्यादा खुल सकता है। उनका तर्क है कि अमेरिका में खेती बड़े पैमाने पर होती है और वहां आधुनिक मशीनरी, तकनीक तथा सरकारी सहायता के कारण उत्पादन लागत कई मामलों में कम हो सकती है।
अगर ऐसे उत्पाद बड़ी मात्रा में भारत में आने लगे तो घरेलू किसानों के सामने कीमत की चुनौती खड़ी हो सकती है। खासकर मक्का, सोयाबीन, तिलहन, पोल्ट्री और डेयरी जैसे क्षेत्रों को लेकर आशंका जताई जाती रही है।
हालांकि सरकार का कहना है कि भारत ने अपने संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों की सुरक्षा की है और गेहूं, चावल, मक्का, सोयाबीन, डेयरी तथा अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसी रियायत नहीं दी गई है जिससे भारतीय किसानों पर सीधा दबाव पड़े।
अमेरिकी कृषि की एक बड़ी विशेषता आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल है। भारत में जीएम खाद्य फसलों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। किसानों और कृषि संगठनों की चिंता है कि अगर भविष्य में अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात बढ़ता है तो जीएम और गैर-जीएम उत्पादों को लेकर नियमन और बाजार पर असर पड़ सकता है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि व्यापार समझौते के कारण भारत की मौजूदा खाद्य सुरक्षा और जीएम संबंधी नीतियों में स्वतः कोई बदलाव नहीं होता। इसलिए फिलहाल इसे सीधे तौर पर 'जीएम उत्पादों की भारत में खुली एंट्री' कहना सही नहीं होगा।
इस पूरे समझौते में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि अमेरिकी बाजार में मिली रियायत का फायदा किसान की जेब तक कैसे पहुंचेगा? किसानों को निर्यात से जोड़ने के लिए कोल्ड स्टोरेज, पैकेजिंग, गुणवत्ता जांच, प्रसंस्करण इकाइयां और परिवहन व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
छोटे और सीमांत किसान सीधे अमेरिकी खरीदारों तक नहीं पहुंच सकते। उन्हें किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और निर्यातकों के जरिए बाजार से जोड़ना होगा।
इसके अलावा किसानों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों की जानकारी देनी होगी। अमेरिका में खाद्य सुरक्षा, पैकेजिंग और गुणवत्ता को लेकर कड़े नियम हैं। अगर भारतीय उत्पाद इन मानकों पर खरे नहीं उतरते तो शुल्क में मिली राहत भी ज्यादा काम नहीं आएगी।
| क्षेत्र | फायदा | चिंता |
|---|---|---|
| 🌶️ मसाले | निर्यात बढ़ सकता है | गुणवत्ता मानक |
| ☕ चाय- कॉफी | बेहतर बाजार | प्रतिस्पर्धा |
| 🥭 फल | नए निर्यात अवसर | सख्त नियम |
| 🌱 कपास | कपड़ा निर्यात से लाभ | वैश्विक मांग पर निर्भरता |
| 🌾 गेहूं | अभी सुरक्षित | भविष्य की चिंता |
| 🍚 चावल | समझौते से बाहर | आगे की वार्ता |
| 🥛 डेयरी | संरक्षण बरकरार | किसान सतर्क |
| 🌽 मक्का | फिलहाल सुरक्षित | GM मक्का का डर |
| 🌱 सोयाबीन | तत्काल असर नहीं | सस्ते आयात का खतरा |
| 🐔 पोल्ट्री | समझौते से बाहर | अमेरिकी उत्पादों की आशंका |
इसका जवाब सीधा हां या ना में देना मुश्किल है। फायदा इसलिए है, क्योंकि भारतीय मसाले, चाय, कॉफी, फल, मेवे और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिल सकती है। इससे निर्यात बढ़ सकता है और किसानों को बड़े बाजार का लाभ मिल सकता है।
खतरा इसलिए है, क्योंकि व्यापार समझौते का अगला चरण यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए ज्यादा बाजार खोलता है तो कुछ भारतीय कृषि क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इसलिए भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह निर्यात के अवसर और घरेलू कृषि सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखे।
फरवरी 2026 का अंतरिम व्यापार ढांचा अंतिम भारत-अमेरिका व्यापार समझौता नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत आगे भी जारी रहेगी। यही वजह है कि किसानों के लिए आने वाले महीनों में कृषि से जुड़े प्रावधान सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवेदनशील फसलों और डेयरी क्षेत्र की सुरक्षा बनी रहे। साथ ही जिन कृषि उत्पादों को अमेरिकी बाजार में मौका मिला है, उनके निर्यात के लिए किसानों को बेहतर बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए।
Updated on:
14 Aug 2026 12:30 pm
Published on:
14 Aug 2026 12:30 pm
