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कब पढ़ेगा भारत… 73 फीसदी बच्चे सीनियर सैकंडरी से पहले छोड़ रहे स्कूल

प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूल में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 ही सीनियर सेकेंडरी तक पहुंच पा रहे हैं, जबकि 73 बच्चे बारहवीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं
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नई दिल्ली। देश में सरकारी क्षेत्र में शिक्षा का दायरा बढ़ा, स्कूलों तक पहुंच बढ़ी है, शिक्षक बढ़े हैं और छात्र-शिक्षक अनुपात भी बेहतर हुआ है। हर बच्चे तक कलम-किताब पहुंचाने के तमाम दावों और योजनाओं के बीच स्कूली शिक्षा की बेहद कड़वी और चिंताजनक तस्वीर सामने संसद की प्राक्कलन समिति ने दिखाई है। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूल में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 27 ही सीनियर सेकेंडरी तक पहुंच पा रहे हैं, जबकि 73 बच्चे बारहवीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि बच्चों को स्कूल में बनाए रखने की चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।

दअसल, देश में 2024-25 में प्राथमिक स्तर पर 9.11 लाख स्कूलों की तुलना में 4.12 लाख उच्च प्राथमिक, 1.61 लाख माध्यमिक स्कूल है। जबकि इन सब पर उच्च माध्यमिक स्तर पर केवल 90,866 स्कूल हैं। प्राथमिक कक्षाओं में 6.18 करोड़ विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया, जो उच्च माध्यमिक तक आते-आते 73 फीसदी कम होकर 1.64 करोड़ रह गए।

इस तरह घटते जा रहे बच्चे

स्कूल नामांकित बच्चों की संख्या (करोड़ में)स्कूलों की संख्या (लाख)
प्राथमिक 6.189.11
उच्च प्राथमिक 4.084.12
माध्यमिक 2.361.61
उच्च माध्यमिक 1.640.90

स्कूल घटे, शिक्षक बढ़े, लेकिन बच्चों को रोक नहीं पा रही व्यवस्था

प्राक्कलन समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश में स्कूली शिक्षा के कई संकेतकों में सुधार हुआ है। छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर हुआ है और शिक्षकों की संख्या भी बढ़ी है। इसके बावजूद माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5 फीसदी बनी हुई है, जो बताती है कि बड़ी संख्या में बच्चे आठवीं के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहे हैं। समिति ने बताया कि वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। इसके ठीक उलट, शिक्षकों की संख्या 85.62 लाख से बढक़र 1.01 करोड़ पहुंच गई।

सीखने की गुणवत्ता भी चिंता का विषय

समिति ने पाया कि कई बच्चे कक्षानुसार अपेक्षित सीखने का स्तर हासिल नहीं कर पा रहे हैं। शुरुआती कक्षाओं में पढऩे, लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर रहने का असर आगे की पढ़ाई पर पड़ता है और अंतत: ड्रॉपआउट बढ़ रहा है। इसी कारण समिति ने ‘निपुण भारत मिशन’ को और प्रभावी ढंग से लागू करने की सिफारिश की है, ताकि तीसरी कक्षा तक सभी बच्चों में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक क्षमता विकसित की जा सके।

पढ़ाई छोडऩे के कारण गिनाए

  1. कमजोर बुनियादी नीव: प्राथमिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान का आधार कमजोर
  2. स्कूलों की कमी और दूरी: प्राथमिक स्कूलों की तुलना में सीनियर सैकंडरी स्कूलों की संख्या केवल 10 फीसदी होने के कारण ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है
  3. आर्थिक और सामाजिक दबाव: माध्यमिक स्तर की उम्र में आते-आते गरीब परिवारों के बच्चों (विशेषकर लडक़ों) पर मजदूरी या काम करने का दबाव बढ़ जाता है, जबकि बालिकाओं के लिए सुरक्षा व दूरी बड़ी बाधा बनती है।
  4. 4 शिक्षक प्रशिक्षण में भारी गिरावट: वर्ष 2022 में जहां 53 लाख से अधिक शिक्षकों ने ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया था, वहीं वर्ष 2025 में यह घटकर मात्र 1.63 लाख रह गया। जब शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होंगे, तो शिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित होना लाजमी है।

बच्चों को स्कूल लाने के लिए दी सिफारिश

  1. निपुण भारत को कड़ाई से लागू करें: शुरुआती कक्षाओं में ही बच्चे की बुनियादी समझ और पढऩे-लिखने की क्षमता को मजबूत किया जाए, ताकि आगे चलकर वह पढ़ाई न छोड़े।
  2. मजबूत स्टूडेंट ट्रैकिंग सिस्टम: हर बच्चे की उपस्थिति और प्रगति की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग हो, जिससे किसी बच्चे के लगातार गायब रहने पर समय रहते कदम उठाया जा सके।
  3. वार्षिक शिक्षक प्रशिक्षण लक्ष्य: शिक्षकों के ऑनलाइन व ऑफलाइन प्रशिक्षण के लिए सालाना लक्ष्य तय किए जाएं और इस प्रक्रिया को निरंतर जारी रखा जाए।