23 सितंबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

संरक्षण को तरसती देवों की नगरी देवगढ़, कभी प्रतापगढ़ रियासत की राजधानी थी

अब खंडहर में तब्दील हो रहा इतिहास
2 min read
Google source verification
संरक्षण को तरसती देवों की नगरी देवगढ़, कभी प्रतापगढ़ रियासत की राजधानी थी

संरक्षण को तरसती देवों की नगरी देवगढ़, कभी प्रतापगढ़ रियासत की राजधानी थी

प्रतापगढ़. कांठल का इलाका अपने आप में समृद्ध इतिहास समेटे हुए हैं। भारतीय संस्कृति की कई पुरानी स्मृतियों के अवशेष आज भी जिले में दिखाई दे रही हैं। जिसमें कई ऐतिहासिक महत्व की धरोहरें भी धूल-धूसरित हो रही है। पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते यहां की इमारतें, छतरियां और मंदिर आदि जीर्ण-क्षीर्ण होते जा रहे हैं। क्षेत्र के लोग मानते हैं कि पुरानी इमारतों का रख-रखाव होने से पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता हैं।
लुभाती है स्थापत्य कला
संस्कृति और लोककला को दर्शाती जिला मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर दूर स्थित देवगढ़ स्वयं में ही ऐतिहासिक नगरी है। यहां के मंदिरों में अनोखी कलाकृति देखने को मिलती हैं। प्राचीन शहर और कभी प्रतापगढ़ रियासत की राजधानी रहे देवगढ़ मेें कई ऐसे मंदिर हैं। जहां विराजित पुरातात्विक प्रतिमा और कलाकृति देखते ही लुभा लेती हैं। यहां के मंदिरों में आकर्षक मूर्तियां भी विराजित है। पुरातात्विक विभाग की अनदेखी के चलते यह नगरी दिनों-दिन उजाड़ होती जा रही हैं। यहां बने प्राचीन मंदिर रख-रखाव के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। यहां सुरक्षा नहीं होने के कारण कई मंदिरों में मूर्तियां तक गायब हो चुकी हैं। देवगढ़ में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 52 मंदिर बने हुए हैं।
छतरियां करती है आकर्षित
देवगढ़ में प्रवेश करते ही प्राचीन मंदिर और छतरियां बनी हुई है। जो हर किसी को अपनी और आकर्षित करती हैं। यहां बनी छतरियां भी प्राचीन कलाकृति की अनोखी मिशाल पेश करती है। लेकिन लम्बे समय से अनदेखी के कारण अब यह भी क्षतिग्रस्त होती जा रही हैं। लम्बे समय से इन पर ना तो रंग-रोगन हुआ है। ना ही इनकी समय-समय पर सफाई। मंदिरों व छतरियों पर बनी कलाकृति यहां आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेती है, लेकिन पर्यटन के बेहतर इंतजाम नहीं होने के कारण अब यहां पर्यटक भी आना कम हो गए हैं।
राजाओं की नगरी होने के कारण बनी हुई है कई बावडिय़ां
देवगढ़ राजाओं की नगरी होने के कारण यहां कई बावडिय़ां भी बनी हुई हैं। मंदिरों के साथ-साथ यहां की बावडिय़ों की भी नक्काशी अनोखे तरीके से की हुई हैं। यहां की बावडिय़ों का निर्माण अनोखे तरीके से किया गया है। बावडिय़ों में सीढिय़ां उतरने के बाद दोनों तरफ गुफाएं भी बनी हुई है।
मंदिरों पर घासफूस व पेड़
यहां बने मंदिरों, दरवाजों व छतरियों पर अनदेखी के कारण घासफूस व बड़े-बड़े पेड़ तक उग गए हैं। सरकार की अनदेखी और पुरातत्व विभाग की लापरवाही के चलते इन ऐतिहासिक धरोहरों की बेकद्री हो रही है। प्रशासन प्राचीन धरोहरों की रक्षा के लिए भले ही आश्वासन देता रहा हो, लेकिन हालात जस के तस हैं। सुंदरता और कलाकृतियों की भव्यता नष्ट होने के कगार पर है। यही नहीं आज युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने के साथ पुरानी संस्कृति को भी भूलते जा रहे हैं।