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शोधार्थियों की पहली पसंद बनी प्रतापगढ़ की थेवा कला

ज्वैलरी डिजाइनिंग संस्थाओं की रूचि बढ़ी

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शोधार्थियों की पहली पसंद बनी प्रतापगढ़ की थेवा कला

प्रतापगढ़. स्वर्णाभूषणों पर उकेरी जाने वाली प्रतापगढ़ की थेवा कला आमजन के साथ-साथ शोधार्थियों का भी ध्यान आकर्षित कर रही है। इस कला पर शोध के लिए देश विदेश से कई शोधार्थी इन दिनों प्रतापगढ़ आ रहे हैं। कभी प्रतापगढ़ के कुछ परिवारों तक सीमित रही थेवा कला अब देशभर में अपने पंख फैला रही है। देश के कई ज्वैलरी डिजाइनिंग संस्थानों की इसमें रूचि बढ़ रही है। वे इस कला को सीखने और शोध करने के लिए प्रतापगढ़ में महीनों तक रूकते हैं।
ये आभूषण बनते हैं थेवा में
थेवा कला में नारी श्रृंगार की सामग्री से लेकर सजावटी सामान तक बनते हैं। नेकलेस, मंगलसूत्र, टॉप्स पेंडल, अंगूठी, लटकन आदि आभूषण बनाए जाते हैं। साथ ही सजावटी समान यथा प्लेट, पानदान, बैंगल बॉक्स, एश ट्रे आदि बनाए जाते हैं।
क्या है इतिहास
थेवा कला करीब ढाई सौ साल पुरानी है। यह राजघरानों के संरक्षण में आगे बढ़ी। थेवा आभूषण बनाने वाले स्वर्णकारों को राजपरिवारों ने अपने दरबार में जगह दी। इसलिए आज भी इन परिवारों को राजसोनी कहा जाता है। प्रतापगढ़ में 'थेवा कला' को जानने वाले अब गिने-चुने परिवार ही बचे हैं। इस कला में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए के प्रतापगढ़ के दिवगंत महेश राजसोनी को पद्मश्री से अलंकृत किया जा चुका है। प्रतापगढ़ के और भी कई कलाकारों को इस अनूठी कला के लिए कई अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार मिल चुके हैं। थेवा कला को पहले पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया। इसमें महिलाओं को इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता था। कुछ परिवारों का ही एकाधिकार था, लेकिन अब विष्णु सोनी जैसे कुछ कलाकार हैं, जो इस कला को एक दायरे से आगे बढ़ा रहे हैं और कई लोगों को प्रशिक्षण दे रहे हैं।
यह है थेवा कला
'थेवा कला' विभिन्न रंगों के कांच को चांदी के महीन तारों से बनी फ्रेम में डालकर उस पर सोने की बारीक कलाकृतियां उकेरने की अनूठी कला है। समूचे विश्व में प्रतापगढ़ ही एकमात्र वह स्थान है, जहां अत्यंत दक्ष ‘थेवा कलाकार' छोटे-छोटे औजारों की सहायता से सोने पर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां बनाते हैं। थेवा कला के रूप में प्रतापगढ़ का नाम पूरे विश्व पटल पर प्रसिद्ध है।
कैसे बनते हैं थेवा के आभूषण
थेवा कला' में सोने की बारीक कलाकृतियां उकेरी जाती हैं। जिन्हें कुशल और दक्ष हाथ छोटे-छोटे औजारों की मदद से बनाते हैं। इस कला में पहले कांच पर सोने की शीट लगाकर उस पर बारीक जाली बनाई जाती है, जिसे 'थारणा' कहा जाता है। दूसरे चरण में कांच को कसने के लिए चांदी के बारीक तार से फ्रेम बनाया जाता है, जिसे 'वाडा' बोला जाता है। उसके बाद इसे तेज आग में तपाया जाता है। इसके बाद सोने की कलाकृति और खूबसूरत डिजाइन उभर कर आती है। थेवा कलाकार विष्णु बताते हैं कि थेवा में सोने की प्लेट पर कई आकृतियां बनाई जाती है। इनमें राजस्थान की लोककथाओं का चित्रण होता है। इसे कांच के फ्रेम जड़ दिया जाता है। नीचे सपोर्ट के लिए चांदी पर सोने की प्लेटिंग किया जाता है। प्रारम्भ में 'थेवा' का काम लाल, नीले और हरे रंगों के मूल्यवान पत्थरों हीरा, पन्ना आदि पर ही होता था, लेकिन अब यह काम पीले, गुलाबी और काले रंग के कांच के रत्नों पर भी होने लगा है।
कहां-कहां से आते हैं शोधार्थी
थेवा कला सीखने और इस पर शोध करने के लिए देश के कोने कोने से युवा आ रहे हैं। थेवा कला के राज्य स्तरीय पुरस्कार और यूनेस्को पुरस्कार से सम्मानित विष्णु सोनी ने बताया कि इस कला के प्रति अब राजस्थान से बाहर भी रुचि बढ़ रही है। पिछले दो साल में उनके पास प्रशिक्षण के लिए आने वालों की संख्या में निरंतर बढोतरी हो रही है। उनके पास अहमदाबाद, दिल्ली, मुम्बई और मध्यप्रेदश के इंदौर, भोपाल आदि कई शहरों से कई प्रशिक्षार्थी यहां आते हैं। डिजाइनिंग संस्थान के छात्रों की इसमें विशेष रूचि है। वे यहां आकर ज्वैलरी की डिजाइनिंग पिछले दिनों दिल्ली से शोधार्थियों की एक टीम यहां आई थी, जिसने दो तीन दिन रहकर पूरी कला पर शोध किया।
थेवा पर शोध कर रही हैं दिल्ली की शिवानी
कुछ साल पहले मैं भारत की गुमनाम और लुप्त होती कलाओं पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने के लिए शोध कर रही थी। इसी सिलसिले में एक दिन लाइब्रेरी में पुस्तकें पलटते हुए मुझे थेवा के बारे में कुछ जानकारी मिली। फिर मैंने इसके बारे में और अध्ययन किया। जब यह पता चला कि राजस्थान की इस दुर्लभ कला को प्रतापगढ़ के महज कुछ चंद लोग ही बचाए हुए हैं तो मेरी इसमें दिलचस्पी और बढ़ गई। लिहाजा मैंने इस पर विस्तार से शोध करने, फोटोग्राफी करने और डाक्यूमेट्री बनाने का मन बनाया। इसके लिए मुझे भारत सरकार के एक कला संस्थान से फेलोशिप मिली गई है। इसके तहत ही मैं थेवा कला पर शोध कर रही हूं। शोध के सिलसिले में मैं कई बार प्रतापगढ़ आ चुकी हूं। यहां थेवा आर्ट में लगे सोनी परिवारों से मिल चुकी हूं। यह कला अद्भुत हैं।
शिवानी पांडेय, शोधकर्ता थेवा आर्ट और राइटर, फोटोग्राफर व फिल्ममेकर, दिल्ली