कांठल में घास को लील रही खरपतवार

प्रतापगढ़
मालवा व आगे मध्य भारत तक निष्क्रमण पर जाकर पुन: मारवाड़ की ओर आने वाले भेड़ों व रेवड़ के झुण्ड के साथ आई पिछले तीन दशक से खतरनाक खरपतावर हिपटिस सुविओलेन्स कांठल की धरा से घास को लीलती जा रही है। इसके यहां पैर पसारने के कारण मवेशियों के लिए घास की कमी होने की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही है। इस खरपतवार के उन्मूलन की आज महत्ती आवश्यकता है।

By: Devishankar Suthar

Published: 20 May 2021, 08:04 AM IST


भेड़ों के साथ आई मध्य भारत से हिपटिस सुविओलेन्स नामक खरपतवार
प्रतापगढ़
मालवा व आगे मध्य भारत तक निष्क्रमण पर जाकर पुन: मारवाड़ की ओर आने वाले भेड़ों व रेवड़ के झुण्ड के साथ आई पिछले तीन दशक से खतरनाक खरपतावर हिपटिस सुविओलेन्स कांठल की धरा से घास को लीलती जा रही है। इसके यहां पैर पसारने के कारण मवेशियों के लिए घास की कमी होने की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही है। इस खरपतवार के उन्मूलन की आज महत्ती आवश्यकता है। इसके लिए हमें अभी से चेतना होगा। अन्यथा वो दिर दूर नहीं जब गाजरघास की तरह खतरनाक खरपतावर हिपटिस सुविओलेन्स भी कांठल में पैर पसार लेगी। तुलसी कुल का एक शाकीय पादप इन दिनों प्रतापगढ़ के समस्त वन क्षेत्रों में बहुतायत से पाया जाता है। जो प्रतिवर्ष बढ़ती ही जा रही है।
बारिश में उगती है ये खरपतवार
बारिश का मौसम शुरू होते ही यह शाकीय पादप उगना शुरू करता है। इसके बढऩे की गति भी काफी अधिक होती है। जबकि घास प्रजातियांं तो इससे काफी पीछे रह जाती है।कारण यह है कि घासों की बढ़वार के लिए प्रकाश की आवश्यकता अपेक्षाकृत अधिक होती है। हिपटिस सुविओलेन्स इतनी तेजी से बढ़ता है कि पूरी जमीन को ढक लेता है। घास तक सूर्य का प्रकाश पहुंचने ही नहीं देता। अक्टूबर के माह में पुष्प खिल जाते हैं और उसका पुष्प नवम्बर अंत तक फल में बदल जाता है। इससे कई बीज हो जाते हैं। जो अगली वर्षा का इंतजार करते है।
तीक्ष्ण बदबू से पशु भी दूर
इस खरपतवार को कोई भी पालतू पशु अथवा वन्यजीव नहीं चरता है। इसका कारण यह है कि इसमें तीक्ष्ण बदबू होती है। इसकी कोई उपयोगिता भी नहीं होती है।
वेस्ट इण्डिज का मूल पौधा
इस पादा की ऊंचाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तक होती है। यह पादप मूल रूप से वेस्ट इण्डीज का है। प्रतापगढ वनमण्डल के वन क्षेत्रो में लगभग 30 वर्ष पहले तक यह खरपतवार नहीं पाई जाती थी। परन्तु साल दर साल मध्य भारत की और निष्क्रमण पर जाने वाली भेड़ें इस खरपतवार का बीज यहां के वन क्षेत्रों में भी ले आई। परिणाम यह हुआ कि मालवा के पठार एवं अरावली के इस संगम स्थल पर उगने वाली पौष्टिक घास प्रजातियों को यह खरपतवार लील गई है।
खत्म होते जा रहे घास के मैदान
इसके बेहद खतरनाक परिणाम पालतू पशुओं व तृणहारी वन्यजीवों को भुगतने होंगे। यह खपतवार अच्छी गहराई वाली मृदा से लेकर पथरीली मृदा में भी खूब उगती है। इससे यहां के घास के मैदान भी लगातार कम होते जा रहे हैं।

करना होगा खरपतवार का उन्मूलन
इस खतरनाक खरपतवार के उन्मूलन के लिए हमें अभी चेतना होगा। अन्यथा क्षेत्र में पशुओं के लिए घास की समस्या हो जाएगी।इसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। इसके प्रबंधन के लिए किया गया कार्य हमारी जैव विविधता संरक्षण की दिशा में एक महत्व पूर्ण कदम साबित हो सकता है।
लक्ष्मणसिंह चिकलाड़
पर्यावरणविद्, प्रतापगढ़

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