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‘नहीं ले गए तो नहीं गए’ अतीक अहमद के आखिरी शब्द, फिर गोलियों की तड़तड़ाहट, खत्म हुआ पूर्वांचल का खौफ

प्रयागराज में जन्मे अतीक अहमद ने छोटे अपराधों से शुरुआत कर पूर्वांचल का बड़ा माफिया साम्राज्य खड़ा किया। राजनीति में आकर उसका प्रभाव और बढ़ा।

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अतीक अहमद बना पूर्वांचल का खौफ

अतीक अहमद बना पूर्वांचल का खौफ Source- X

Atiq Ahmed Story: पूर्वांचल के गलियारों में आज भी वो आवाज़ गूंजती है, गोलियों की तड़तड़ाहट। एक फोन कॉल, बस एक कॉल अतीक का, और किसी का नाम खत्म। कोई सवाल नहीं, कोई गवाह नहीं। प्रयागराज से लेकर लखनऊ तक, बांदा, फतेहपुर तक का माफिया साम्राज्य एक इशारे पर चलता था। लेकिन 15 अप्रैल 2023 को, ठीक आज के ही दिन, उसी गोलियों की बौछार ने उसके सफर का अंत कर दिया।

प्रयागराज में हुआ जन्म

1962 में प्रयागराज के एक गरीब मुस्लिम मोहल्ले में पैदा हुआ अतीक। पिता टांगा चलाते थे, मां घर संभालती थीं। स्कूल छोड़कर छोटी-मोटी चोरियां शुरू कीं, ट्रेन से कोयला चुराना, ठेकेदारों को धमकाकर रेलवे स्क्रैप का ठेका हथियाना। उम्र सिर्फ 17-18 साल थी, जब 1979 में प्रयागराज में पहला हत्या का मुकदमा लगा। चार्ज साबित नहीं हो सका, लेकिन यहीं से उसकी क्रिमिनल जिंदगी की नींव पड़ी। 1984 में दूसरा हत्या का केस दर्ज हुआ। अब वो इंटर-स्टेट गैंग 227 का सरगना बन चुका था। चांद बाबा जैसे साथियों के साथ मिलकर उसने पूरे पूर्वांचल को अपनी जेब में कर लिया।

हर वक्त सताता था एक कॉल

अतीक का नाम सुनते ही ठेकेदार कांपते, नेता सिर झुकाते। एक्सटॉर्शन, किडनैपिंग, लैंड ग्रैबिंग, सब उसके मेन्यू में थे। 1990 में उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी शौकत इलाही का एनकाउंटर हो गया, तो अतीक बेखौफ हो गया। एक कॉल पर मर्डर, एक कॉल पर गवाह गायब। प्रयागराज की सड़कें खून से लाल हो जातीं, लेकिन कोई सबूत नहीं मिलता। राजनीति में कदम रखा तो सत्ता और अपराध का गठजोड़ और मजबूत हो गया। 1989 से 2002 तक पांच बार इलाहाबाद वेस्ट से विधायक, 2004 में फूलपुर से सांसद। जेल में बैठकर भी चुनाव जीतता था। उसके गुर्गे वोटरों को धमकाते, विपक्षी चुप करा देते।

पहली बार हुई अतीक को सजा

रामू पाल हत्याकांड 2005 का था। गवाह उमेश पाल को अगवा करने का केस 2019 में साबित हुआ। पहली बार सजा हुई-लाइफ इम्प्रिजनमेंट। लेकिन तब तक अतीक का साम्राज्य खड़ा था। सैकड़ों करोड़ की संपत्ति, परिवार में भाई-बेटे सब क्राइम में। बेटा असद भी गैंग का हिस्सा। लेकिन 2023 आया तो सब बदल गया। मार्च में उमेश पाल किडनैपिंग केस में दोषी ठहराया गया। जेल में था। 13 अप्रैल को बेटा असद एनकाउंटर में मारा गया। तीन दिन बाद, 15 अप्रैल को भाई अशरफ के साथ अतीक को मेडिकल चेकअप के लिए पुलिस कस्टडी में ले जाया जा रहा था। प्रयागराज के अस्पताल के गेट पर तीन हमलावर मीडिया वाले बनकरपहुंच गए। "नहीं ले गए तो नहीं गए…" अतीक ने आखिरी बार कहा। फिर गोलियों की बौछार। लाइव टीवी पर पूरा देश देख रहा था। अतीक और अशरफ दोनों ढेर। पूर्वांचल का वो डन, जिसके एक कॉल से सैकड़ों जानें गईं, खुद गोलियों का शिकार बन गया।

आज भी तड़तड़ाहट है याद

अतीक की मौत ने पूर्वांचल को राहत दी, लेकिन वो तड़तड़ाहट अब भी याद दिलाती है। अपराध और राजनीति का घिनौना चक्र कितना खतरनाक होता है। एक गरीब लड़के से माफिया बनने की कहानी, जो आखिरकार उसी हिंसा का शिकार हो गई। आज, तीन साल बाद, 15 अप्रैल को याद आता है, गोलियों का राजा हमेशा के लिए चुप हो गया।