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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ नियमावली 2017 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर प्रदेश सरकार से मांगा जवाव

याचिका पर अगली सुनवाई कोर्ट 15 मई को करेगी

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ नियमावली 2017 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर प्रदेश सरकार से मांगा जवाव

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ नियमावली 2017 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर प्रदेश सरकार से मांगा जवाव

इलाहाबाद. हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश वक्फ नियमावली 2017 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। नियमावली 14 दिसम्बर 2007 को जारी की गयी थी। याचिका में कहा गया है कि यह नयी नियमावली वक्फ एक्ट 1995 के प्रावधानों के विपरीत है। उसके अनुसार प्रदेश सरकार को नियमावली बनाने का अधिकार नहीं है।

याचिका पर पक्ष रख रहे अधिवक्ता एस.एफ.ए.नकवी का कहना था कि नयी नियमावली में सरकार ने वक्फ ट्रिब्यूनल के सदस्यों की संख्या घटाकर दो कर दी है जबकि वक्फ एक्ट की धारा 85 (4) में वक्फ बोर्ड में तीन सदस्यों की व्यवस्था है। इसमें जिला जज स्तर का एक न्यायिक अधिकारी भी होना चाहिए। मामेले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की खण्डपीठ ने इस मामले की जानकारी महाधिवक्ता को देने का निर्देश दिया है ताकि वह अगली तारीख पर सरकार का इस मामले में पक्ष रख सके। याचिका पर कोर्ट 15 मई को सुनवाई करेगी।


गोमांस ले जाने के आरोपी बस ड्राइवर की याचिका खारिज


इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ढाई कुन्तल गोमांस बस में रखकर ले जाने के आरोपी बस ड्राइवर की याचिका खारिज कर दी है। याचिका में पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट की वैधता को चुनौती दी गयी थी। कोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा कि याची यदि कोर्ट में समर्पण करता है तो कोर्ट नियमानुसार उसकी जमानत अर्जी यथाशीघ्र निर्णीत करें। यह आदेश न्यायमूर्ति जे.जे.मुनीर ने रामपुर के रिसायत खां की याचिका पर दिया है।

मालूम हो कि 19 अप्रैल 16 को कासिम व दो अन्य के खिलाफ गोवध और गोमांस की बिक्री के लिए बरेली से रामपुर बस द्वारा ले जाने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। कासिम को मौके से ढाई कुन्तल गोमांस के साथ गिरफ्तार किया। पुलिस ने विवेचना के बाद 25 जुलाई 16 को बस ड्राइवर रिसायत खां और कासिम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। याचिका में चार्जशीट को चुनौती दी गयी थी। और कहा गया था कि गोमांस से याची का कोई सरोकार नहीं है। वह तो बस चला रहा था। प्राथमिकी में उसे नामित नहीं किया गया था। परन्तु कोर्ट ने कहा कि केस डायरी व अन्य तथ्यों को देखते हुए प्रथम दृष्टया अपराध कारित हो रहा है। ऐसे में चार्जशीट में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

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