25 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

फूलपुर लोकसभा में जानिए अब तक का सियासी समीकरण, किसके पक्ष में जनता का रुझान

उपचुनाव में बङे उलटफेर से इंकार नही ,किसे हो रहा फायदा और कौन है सियासी नुकसान में

3 min read
Google source verification
Lok Sabha

Lok Sabha

इलाहबाद फूलपुर लोकसभा के सियासी मैदान चुनाव जंग हर दिन दिलचस्प हो रही है । सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी भारतीय जनता पार्टी जिसे पहली बार फूलपुर लोकसभा में जीत हासिल करने का मौका मिला । वह सीट पर बरकरार रहने के लिए जद्दोजहद कर रही है । भाजपा के 40 स्टार प्रचारकों के साथ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत लगा दी है।तो वहीं विधानसभा चुनाव के साथी रहे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों उपचुनाव में अलग.अलग सियासी तीर चला रहे है।और अपनी ताकत आजमाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहे । समाजवादी पार्टी के प्रचारको की दो दर्जन से ज्यादा पूर्व सांसद और विधायकों का डेरा जमा हुआ है । साथ ही कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की टीम यहां भी डटी है, और एक बार फिर कांग्रेस अपने पैतृक सीट पर अपना कब्जा करने का रास्ता तलाश रही है।

बङे उलटफेर की संभावना से इंकार नही
उपचुनाव में चल रहे सियासी दांव पेच को देखे तो ऐसे में यहाँ बङे उलटफेर की संभावना से इंकार नही किया जा सकता है।इस उपचुनाव को योगी सरकार के सालभर के कामकाज का फीडबैक भी माना जा रहा है । हालाकि अभी तक फूलपुर की जनता किसी के साथ एकतरफा समर्थन करती नही दिख रही है । और ना ही जीत हार को लेकर अपनी मुठ्ठी खोल रही है । फूलपुर उपचुनाव न केवल प्रदेश के लिए बल्कि 2019 के आम चुनावों के लिए भी खास बन सकता है।ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा की फूलपुर लोकसभा का पंडित नेहरू से केशव मौर्या तक के सफर के बाद क्या इतिहास रचेगा ।

कांग्रेस को क्या मिल रहा फायदा
कांग्रेस प्रत्याशी मनीष मिश्रा स्थानीय क्षेत्र के जाने माने नेताओं में से एक हैं।कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ है।और युवाओं का साथ उन्हें मिल रहा है । मनीष मिश्रा को पिता जेएन मिश्रा क़ी विरासत का भी लाभ मिल रहा है ।साथ में मनीष मिश्रा के चुनाव मैदान में आने से भाजपा के माथे पर पसीना देखा जा सकता है । तो वही कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी जो सामने आ रही है उसको देखे तो कांग्रेस का कैडर वोट छोड़ दीजिए तो बेस वोट का अभाव है। दूसरी तरफ सपा का भी प्रत्याशी मैदान में है तो मुश्किलें कम नहीं हैं ।

नागेंद्र पटेल को मिल रहा विरादरी का साथ
नागेंद्र सिंह पटेल सपा के पुराने नेता हैं ।संगठन में काम के काम का अच्छा अनुभव हैं। सपा में और यादव समाज में अच्छी पकड़ है। रेलवे के बड़े ठेकेदार हैं।नागेंद्र सिंह पटेल के साथ बसपा प्रत्याशी ना उतरने पर समीकरण बहुत मजबूत है ।और बसपा के सहयोग से सांसद बनना आसान भी दिख रहा है।जातीय समीकरण भी पक्ष में है।लेकिन सपा के ही नेता पूर्व सांसद बाहुबली अतीक अहमद चुनावी मैदान में आने से सपा से जुड़े मुसलमानों को भी वोट कट रहा है । जो सपा के लिये एक बड़ी चुनौती है ।

पैराशूट प्रत्याशी को जिताना भाजपा के लिये चुनौती
भारतीय जनता पार्टी की बात करे तो भाजपा कैडर बेस पार्टी के साथ साथ वोट बेस पार्टी है । कौशलेंद्र भले ही वाराणसी के हैं लेकिन स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में गजब का उत्साह है । केन्द्र व राज्य सरकार के कार्यों को भुना सकते है ।लेकिनपार्टी में इस बात की नाराजगी व्यक्त की जा रही है ।की कौशलेंद्र सिंह पैराशूट प्रत्याशी हैं सबसे पहले उन्हें अपने समाज का वोट बचाने के लिए और सबके साथ घुलने मिलने में ही समय देना पड़ रहा है। भाजपा के फ्लोटिंग वोट को रोकना सपा वोट की रणनीति के साथ साथ पूर्व पत्नी का उत्पीङन आरोप भाजपा प्रत्याशी को परेशान कर रहा है जो भजापा के खिलाफ विरोधियो के हाथ में बड़ा मुद्दा हैं।

अतीक ने बिगाड़ दिया सबका खेल
तो वही हो रहे उपचुनाव में पूर्व सांसद बाहुबली नेता अतीक अहमद ने जेल से निर्दलीय नामांकन कर सभी सियासी समीकरण को तोड़ दिया है। अतीक अहमद फूलपुर से सांसद रह चुके हैं और समुदाय विशेष के मतदाताओं पर अच्छी पकङ रखते हैं। अब सबकी नजर बसपा पर है । बसपा ने उपचुनाव न लड़कर अपनी पुरानी परम्परा को कायम रखा कयास लगाये जा रहे है की मायावती अतीक अहमद का समर्थन कर सकती है। ऐसे में सभी विरोधी दलों के लिये यह सीट जितना मुश्किल होगा ।हालाकि मायावती ने अभी अपने पत्ते नही खोले है ।और न ही किसी तरह के समर्थन की बात सामने आयी है ।