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रील्स के दौर में 3 घंटे का नाटक हिट, यही शिवाजी महाराज के चरित्र की शक्ति

CG News: जाणता राजा प्ले के निर्देशक योगेश गजानन शिरोले 22 वर्षों से इस प्ले से जुड़े हैं। उन्होंने पत्रिका के साथ बातचीत में अपने अनुभव साझा किए..

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निर्देशक योगेश गजानन शिरोले से विशेष बातचीत ( Photo - Patrika )

CG News: ताबीर हुसैन. राजधानी के साइंस कॉलेज मैदान में इन दिनों ऐतिहासिक महानाटक जाणता राजा का मंचन चल रहा है। 22 फरवरी तक आयोजित इस भव्य नाटक के निर्देशक योगेश गजानन शिरोले 22 वर्षों से इस प्ले से जुड़े हैं। 1985 से निरंतर मंचित हो रहे इस महाकाव्यात्मक नाट्य प्रयोग में लगभग 200 कलाकार, जीवंत किले का सेट, घोड़े-हाथी और प्रभावी ध्वनि-प्रकाश संयोजन के माध्यम से छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। प्रस्तुति के प्रबंधन, तकनीक और उद्देश्य पर निर्देशक से विशेष बातचीत।

CG News: लगभग 200 लोगों की टीम, घोड़े-हाथी और विशाल मंच व्यवस्था। पर्दे के पीछे इसका प्रबंधन कैसे करते हैं?

इस नाटक की खासियत सामूहिक कार्यप्रणाली है। हम सबको एक सूत्र में जोडक़र काम करते हैं। हर कलाकार और तकनीकी सदस्य को पहले से उसकी जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी जाती है। नियमित बैठकों में पूरा प्लान समझाया जाता है, इसलिए मंचन के समय सभी अपने-अपने कार्य में सहज रूप से जुड़ जाते हैं। यही अनुशासन और टीमवर्क इतनी बड़ी प्रस्तुति को संभव बनाता है।

जो भव्य किले जैसा सेट दिखता है, उसे लाना-ले जाना और खड़ा करना बड़ी चुनौती होगी?

यह बहुस्तरीय किले का सेट है, जिसमें पीछे पहाड़ और किले की संरचना दिखाई देती है। इसे खड़ा करने में 3-4 दिन लगते हैं। लगभग एक माह पहले पूरा प्री-प्लान बनाया जाता है। कितनी टीम पहले जाएगी, कौन सा भाग कब तैयार होगा। हमने बिलासपुर सहित कई शहरों में यही सेट स्थापित किया है। हमारे पास ऐसे तीन सेट हैं, जिन्हें स्थान के अनुसार एडजस्ट किया जाता है।

वर्षों में तकनीकी बदलाव भी हुए होंगे?

पहले सेट खड़ा करने में 10-12 दिन लगते थे, तकनीकी सुधार से अब 4 दिन में तैयार हो जाता है। ध्वनि तकनीक भी स्पूल से कैसेट, फिर सीडी और अब फोर-ट्रैक डिजिटल रिकॉर्डिंग तक विकसित हुई है। आज ध्वनि-प्रकाश इस नाटक की आत्मा हैं। यदि घोड़े दौड़ते दिखते हैं तो उनकी दिशा के अनुसार ध्वनि आती है, सेना चलती है तो सामूहिक पदचाप सुनाई देती है। लाइट भी दृश्य और समय के अनुसार बदलती है, जिससे प्रस्तुति जीवंत लगती है।

कलाकारों का प्रशिक्षण और अनुशासन कैसे बनाए रखते हैं?

नाटक का उद्देश्य केवल मनोरंजन या आय नहीं, बल्कि शिवाजी महाराज के चरित्र का प्रसार है। हम स्थानीय लोगों को भी जोड़ते हैं। यहां जात-पात या धर्म का भेद नहीं, गुणवत्ता के आधार पर अवसर मिलता है। शिवाजी महाराज का आदर्श ही यही था। योग्य को स्थान। इसलिए कलाकार भी इसी भावना से जुड़ते हैं और अनुशासन स्वाभाविक रूप से आता है।

क्या यह किसी विशेष समुदाय का नाटक माना जाता है?

बिल्कुल नहीं। यह समाज को संगठित और प्रेरित करने वाला नाटक है। हमारे दल में विभिन्न समुदायों के कलाकार हैं। शिवाजी महाराज पूरे राष्ट्र के नायक हैं, किसी एक वर्ग के नहीं।

क्या कभी राजनीतिक कारणों से नाटक पर प्रतिबंध जैसी स्थिति बनी?

ऐसा कभी नहीं हुआ। 40 वर्षों में देशभर में 1200 से अधिक प्रयोग हुए हैं। शिवाजी महाराज को किसी क्षेत्र या वर्ग में सीमित करना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। उनका चरित्र सार्वभौमिक प्रेरणा है।

आपका व्यक्तिगत सफर कैसा रहा?

मैं 1999 से इससे जुड़ा हूं। पहले कलाकार के रूप में आया, फिर निर्देशन की जिम्मेदारी मिली। आज भी आवश्यकता पडऩे पर मंच पर भूमिका निभाता हूं, जैसे वासुदेव का पात्र। जहां कमी होती है, वहां टीम के साथ समन्वय कर प्रस्तुति को पूर्ण करना ही निर्देशक का काम है।

आज के 15-सेकंड रील्स वाले दौर में तीन घंटे का नाटक दर्शकों को कैसे बांधे रखता है?

यही शिवाजी महाराज के चरित्र की शक्ति है। दर्शक उन्हें अपना मानते हैं। उनका जीवन, संघर्ष और राष्ट्रभावना लोगों के हृदय से जुड़ती है। इसलिए दर्शक पूरे तीन घंटे भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं।