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सिम्स में आग नहीं इस वजह से हुई 5 नवजात बच्चों की मौत, 10 दिन बाद इस अफसर ने कही ये बात

सिम्स प्रशासन इन मौतों के पीछे आग या धुएं का असर होने की बात से साफ़ इनकार कर रहा है, वहीं जिला प्रशासन ने माना है कि इस मामले में लापरवाही हुई है।

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CIMS

शॉट सर्किट से सिम्स अस्पताल में लगी आग, मची अफरा-तफरी, मासूम नवजात की मौत

रायपुर. छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान बिलासपुर स्थित नवजात शिशु सघन चिकित्सा कक्ष में 10 दिनों पहले लगी आग के चपेट में आकर अब तक 5 नौनिहालों की मौत हो चुकी है। वहीं कुछ की हालत गंभीर बनी हुई है। आलम यह है कि बिलासपुर के अलग-अलग निजी अस्पतालों में भर्ती इन बच्चों मौत का आंकड़ा आने वाले दिनों में और भी बढ़ सकता है।

इस बीच सिम्स प्रशासन इन मौतों के पीछे आग या धुएं का असर होने की बात से साफ़ इनकार कर रहा है, वहीं जिला प्रशासन ने माना है कि इस मामले में लापरवाही हुई है। सिम्स के डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेट डॉ. लाखन सिंह ने पत्रिका से विशेष बातचीत में कहा है कि जो बच्चे उस दिन अस्पताल में भर्ती थे उन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया था। हालांकि उनकी हालत पहले से खराब थी।

उन्होंने दावा किया है कि किसी भी बच्चे की मौत आग लगने से या फिर धुएं की वजह से नहीं हुई है। स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव द्वारा कलक्टर की अगुवाई में बनाई गई जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट चार दिन पहले शासन को सौंप दी है। स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारीक से इस गंभीर मामले में बात करने की कई बार कोशिश की गई उन्हें मैसेज भी किया गया, लेकिन उनका जवाब नहीं मिला।

सरकार खामोश, वापस सिम्स लाये जाएंगे बच्चे
सिम्स प्रशासन ने पत्रिका से कहा है कि हम अलग अलग निजी अस्पतालों में भर्ती सभी बच्चों को वापस लेकर आ रहे हैं। इस घटना के बाद सिम्स के दौरे पर गए स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव ने सभी बच्चों के मुफ्त इलाज कराने के आदेश दिए थे। कई स्वयंसेवी संस्थाएं और लोग उनके परिजनों को आर्थिक सहायता पहुंचा रहे हैं। गौरतलब है शिशुओं का इलाज अभी भी शहर के महादेव हॉस्पिटल, डॉ. सिहारे हॉस्पिटल, अपोलो और शिशु भवन में चल रहा है।

दावों में उलझी नौनिहालों की मौत
सिम्स का दावा है कि जनवरी 2018 से दिसम्बर 2018 के बीच सिम्स बिलासपुर के एनआइसीयू में कुल 5,334 बच्चों को भर्ती कराया गया था, जिनमें से 334 गंभीर नवजात शिशुओं की मौत हुई थी। सिम्स का कहना है कि हमारे यहां नवजात शिशुओं की मृत्युदर का प्रतिशत 6.2 है, जो किसी भी अस्पताल से बेहतर है। सिम्स का यह भी दावा है कि उसने विभागाध्यक्ष के नेतृत्व में दो बाल रोग विशेषज्ञों की टीम उन बच्चों की सतत निगरानी के लिए लगा रखी है। डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेट डॉ लाखन सिंह का कहना है कि आग नीचे की फ्लोर में लगी थी, बच्चे ऊपर के फ्लोर में थे।

कलक्टर, बिलासपुर डॉ. संजय अलंग ने कहा, मैंने जांच पूरी करके शासन को सौंप दी है । उन बच्चों का इलाज ठीक से हो, इसलिए दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की ड्यूटी लगाईं गई है, यह घटना कैसे घटी इसका जवाब सिम्स प्रशासन को देना चाहिए।

बिलासपुर सिम्स के डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेट डॉ. लाखन सिंह ने कहा, मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी बच्चे की मौत आग या धुएं की वजह से नहीं हुई है।

यह हैं सवाल
1- जिन बच्चों की हालत पहले से खराब बताई जा रही थी उन्हें आग लगाने के बाद सघन चिकित्सा कक्ष से निकालकर जिला चिकित्सालय में भर्ती क्यों कराया गया? उन्हें पहले ही निजी अस्पताल में क्यों नहीं ले जाया गया।
2 अगर नियोनेटल आइसीयू में आग या धुएं का कोई भी असर नहीं हुआ तो बच्चों को बाहर ले जाने की नौबत क्यों आन पड़ी?
3- अगलगी के दस दिन बाद भी इस मामले में अब तक कोई भी कारवाई क्यों नहीं की गई, सिम्स प्रशासन ने अपने स्तर पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
4- बाल सघन चिकित्सा कक्ष या फिर उसके पास विद्युतीकरण की प्रक्रिया विशेषज्ञों की देख रेख में क्यों नहीं कराई गई?