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ऐसा प्राचीन मंदिर जहां जैन धर्म के तीर्थंकरों की है प्रतिमाएं

छत्तीसगढ़ में मंदिरों की नगरी के नाम से प्राख्यात आरंग महाभारत कालीन महान धर्म निष्ठ राजा मोरधवज कि नगरी थी।

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छत्तीसगढ़ का ऐसा प्राचीन मंदिर जहाँ जैन धर्म के तीर्थंकरों की निर्मित है प्रतिमाएं

छत्तीसगढ़ का ऐसा प्राचीन मंदिर जहाँ जैन धर्म के तीर्थंकरों की निर्मित है प्रतिमाएं

आरंग। रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर राजधानी रायपुर से 36 कि.मी दूर आरंग स्थित है जो छत्तीसगढ़ में मंदिरों की नगरी के नाम से प्रख्यात है।

यह एक प्राचीन नगरी है। इसकी प्राचीनता वहां पर स्थित अति प्राचीन मंदिरो मूर्तियों में महीन नक्काशी और ताम्रपत्र अभिलेख से मालूम पड़ती है। आरंग महाभारत कालीन महान धर्म निष्ठ राजा मोरधवज कि नगरी थी। उन्होने अपने शासन काल में अनेक मंदिर का निर्माण कराया था जिसके अवशेष आज भी प्राप्त होते हैं।

वैसे तो आरंग में अनेक मंदिर हैं। जिनमें मुख्य रूप से भांड देवल मंदिर, बाघ देवल मंदिर , महामाया माता मंदिर, चंडी महेश्वरी मंदिर, पंचमुखी महादेव और पंचमुखी हनुमान मंदिर प्रसिद्ध हैं।
लेकिन सबसे प्राचीन मंदिर कि बात की जाए तो इनमे भांड देवल मंदिर का नाम मुख्य रूप से सामने आता है। इसका प्रमाण मंदिर परिसर पर लगे पुरातत्व विभाग के सूचना पटल पर मिलता है।

जानकारी के अनुसार, यह मंदिर भांड देवल नाम से विख्यात है। यह मंदिर जैन धर्म को समर्पित है। मंदिर के गर्भगृह में तीन तीर्थकार की अति सुंदर चमकदार कार्योत्सर्ग मुद्रा में प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है। यह मंदिर पश्चिम मुखी है और ऊंचे स्थान पर स्थित है। नगर शैली में निर्मित इस मंदिर के मंडप का आधार से ऊपर का भाग विनष्ट हो चुका है।

मंदिर की बाहरी दीवार शुरू से लेकर अंत तक उरुश्रृंगों व कलिकाओ से अलंकृत है। जिसमें जैन तीर्थकार देव की प्रतिमाओं के अतिरिक्त मिथुन मूर्तियां उकेरी गई हैं। जानकारी के अनुसार इन्हें 9वीं शताब्दी के शासकों द्वारा निर्मित माना जाता है।

भांड देवल मंदिर के संबंध में ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में भाई बहन एक साथ नहीं जाते हैं। खंडित हो चूके इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने संरक्षण में रखा है। यहाँ पूजा अर्चना नहीं होती है।

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