
दोस्त के शहीद होते ही दुनिया के लिए मिसाल बने ये जवान, पढ़कर आप भी करेंगे सलाम
रायपुर. भारतीय सेना देश की सेवा के साथ-साथ समाज की सेवा भी करती है। देश की रक्षा की जिम्मेदारी सेना के जवानों को दी जाती है। यह जवान किसी भी रूप में हो सकते हैं। डिफेंस में कई सेवाएं हैं, जिनके जरिए हम देश की हिफाजत करते हैं। चाहे पुलिस हो या अन्य कोई फोर्स, लेकिन जनता का जो विश्वास आर्मी यानि थल सेना का है, उसे किसी से नहीं आंका जा सकता।
भारतीय सेना के जांबाजी और जिंदादिली का ऐसा ही एक किस्सा छत्तीसगढ़ में भी है। जहां सीआरपीएफ के जवानों ने अपने साथी के शहीद होने के बाद भी अपनी दोस्ती निभाई। माओवादी मोर्चे पर शहीद साथी जवान राकेश चौरसिया के शहीद होने के बाद उनके साथियों ने अपने दोस्त की बहनों की शादी की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।
करा चुके तीनों बहनों की शादी
शहीद जवान राकेश चौरसिया की तीन वहनें हैं। उनके शहीद होने के बाद सीआरपीएफ के साथी जवान अपने दोस्त की तीनों बहनों की शादी करा चुके हैं। इन जवानों ने तीनों बहनों की शादी के लिए खुद पैसे इक_ा करके राकेश के परिवार को दिए साथ ही ड्यूटी से छुट्टी लेकर बहनों की शादी में शामिल भी हुए।
राकेश की बहन प्रतिमा, प्रभा, आरती व भाई सुरेश ने बताया, पहले उनके एक ही बड़े भैया राकेश थे। उनके शहीद होने के बाद परिवार की स्थिति भी कमजोर हुई। लेकिन अब एक भाई की जगह हमारे पास कई भाई हैं। उनके साथी दोस्त हमेशा परिवार का हाल पूछते रहते हैं। हर सुख-दुख में वे साथ खड़े होते हैं। इनके होने से भाई की कमी नहीं खलती।
राकेश को मिला था वीरता मेडल : माओवादियों मोर्चे पर शहीद जवान राकेश चौरासिया को राष्ट्रपति ने प्रशस्ति पत्र व डीजी वीरता मेडल से नवाजा गया था। शहीद जवान की माता शोभारानी व पिता ज्ञानदास चौरासिया को यह अवार्ड सौंपा गया।
राकेश की इच्छा थी बहनों की हो धूमधाम से शादी
सीआरपीएफ जवानों ने बताया, बिहार के महोबा, मलकपुरा के रहने वाले जवान राकेश अक्सर अपनी बहनों की बात किया करते थे। उसकी इच्छा थी कि वह तीनों बहनों की धूमधाम से शादी कराएं। लेकिन उनकी इच्छा पूरी हो पाती इससे पहले ही वे मुठभेड़ में शहीद हो गए। लेकिन साथी जवानों ने राकेश की इस ख्वाहिश को पूरा करने का बीड़ा उठा लिया। ये साथी हैं डिप्टी कमांडेंट अजय साहा, राजदीप गुप्ता, पंकज मोदी, प्रकाशचंद बदोलिया, विनय कुमार दीपक तिवारी।
ये है दोस्ती की दास्तां
दोस्ती की यह कहानी है सीआरपीएफ के 38 बैच की, जो कादरपुर गुडग़ांव कैम्प से शुरू हुई। 38 बैच के 177 अफसर 27 दिसम्बर 2006 को पास आउट होने के बाद माओवाद प्रभावित सुकमा के सबसे संवेदनशील क्षेत्र चिंतागुफा मेंं तैनात हुए। परिवार से दूर यह जवान अपना हर सुख-दुख साथ बांटते रहे। इस बीच 18 सितम्बर 2009 को चिंतागुफा थाना क्षेत्र के सिंघनमडग़ु में ऑपरेशन के दौरान माओवादियों से मुठभेड़ में सीआरपीएफ के दो अफसर एम. मनोरंजन व राकेश चौरासिया शहीद हो गए।
Published on:
15 Jan 2019 12:33 pm

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