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डीजे के शोर में गुम हुआ बैंड,बाजा, तेज आवाज से लोग हो रहे बहरे, जानिए डीजे की आवाज सेहत के लिए कितनी खतरनाक

ध्वनि को रोकने के लिए न तो निगम कार्रवाई कर नही है न ही पुलिस

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डीजे के शोर में गुम हुआ बैंड,बाजा, तेज आवाज से लोग हो रहे बहरे, जानिए डीजे की आवाज सेहत के लिए कितनी खतरनाक

डीजे के शोर में गुम हुआ बैंड,बाजा, तेज आवाज से लोग हो रहे बहरे, जानिए डीजे की आवाज सेहत के लिए कितनी खतरनाक

जगदलपुर. अब वह दौर गया जब किसी शादी समारोह में बैंड बाजा और लाइटिंग की झालर के साथ बाराती नाचते थिरकते शादी समारोह के मंडप तक पहुंचते थे। इसके लिए शादियों के मौसम में बैंड वालों की दुकान चल निकलती थी । उन्हें पल भर का भी समय नहीं होता था। कुछ घंटे के बाद किसी और बारातियों के दल में बजाने पहुंचना होता था। अब शादियों में बैंड और शहनाई का स्थान तेज तर्रार डीजे ने ले लिया है। इसका शोर एक ओर लोगों को बीमार कर रही है वहीं कई पारंपरिक वाद्य यंत्रों व उनके कलाकारों को बेरोजगार कर दिया है। यही वजह है कि आजकल शादी समारोहों में ध्वनि प्रदूषण 65 डेसीबल और रात में 72 डेसीबल से ज्यादा होने के कारण लोग चिड़चिड़े हो रहे हैं। वहीं कई लोग बहरेपन की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं।

ध्वनि प्रदूषण बहरेपन का एक बड़ा कारण

नाक, कान, गला रोग विशेषज्ञ डॉ सुजीत सिंग बताते हैं कि तेज आवाज यानी ध्वनि प्रदूषण बहरेपन का एक बड़ा कारण है। अगर 80 डेसीबल से अधिक ध्वनि का स्तर है तो यह कानों के लिए बेहद खतरनाक होता है। कान की नसों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और कान के पर्दे भी क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। ध्वनि का स्तर सामान्य रूप से 20 से लेकर 40 डेसीबल तक ही होना चाहिए।

शादियों में डीजे बजाने का मानक तय नहीं

वर्तमान समय में डीजे की धुन पर डांस करने का चलन बढ़ गया है। खासकर शादियों में बारात स्वागत के दौरान बजाये जाने वाले डीजे की तेज आवाज आसपास के इलाके में लोगों के कान के पर्दे खराब करने के लिये काफी है। यहां खुशियों के दौरान बजाये जाने वाले आवाज को लेकर प्रशासन भी किसी तरह का व्यवधान नहीं करती यही वजह है कि लोग शादी ब्याह के अवसर पर जमकर डीजे बजाते हैं।

डीजे की आवाज सेहत के लिए खतरनाक

शादियों और धार्मिक जुलूस के मौंके पर बजाये जाने वाले डीजे की तेज आवाज कई लोगों के सेहत पर असर डाल रही है। भले ही इसका प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देती लेकिन यह धीरे धीर कान के पर्दे को खराब करती है और व्यक्ति को बहरापन की ओर ले जाती है। 65 डेसीबल से अधिक आवाज कान सहित हृदय रोगियों के लिये खतरनाक है। कई मौंके पर व्यक्ति को हार्ट अटैक का खतरा भी बन जाता है।

परम्परागत बैंड बाजे का चलन अब नहीं

कभी तीज त्यौहार व किसी भी उत्साह के दौरान बजाये जाने वाला बैंड बाजे की धुन अब कभी कभी ही सुनाई देती है। पारम्परिक बैंड बाजे की चलन अब शहरों के साथ साथ गांवों से भी गायब होते जा रहा है। छोटी छोटी खुशियों के मौके पर लोग बैंडवाले को बुलाने की परंपरा अब खत्म सी हो गई है। बैंड.बाजा एक परंपरागत वाद्ययंत्र है ।