
Raipur News: आंबेडकर अस्पताल में अब ब्लड की जांच हो सकेगी। पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने सिम्स बिलासपुर से रीएजेंट मंगा लिया है। बुधवार से टायफाइड, यूरिया, हेपेटाइटिस बी, लिपिड प्रोफाइल व थायराइड की जांच हो सकेगी। ये जांच लंबे समय से बंद है। पत्रिका ने इस संबंध में लगातार समाचार प्रकाशित कर मरीजों को हो रही समस्याओं को उजागर किया। इसके बाद रविवार को एसीएस हैल्थ मनोज पिंगुआ ने कॉलेज, अस्पताल व सीजीएमएससी के अधिकारियों की बैठक लेकर इंटर कॉलेज ट्रांसफर सुविधा के तहत रीएजेंट मंगाने को कहा था।
सिम्स बिलासपुर से जो रीएजेंट भेजा गया है, वह 10 से 15 दिनों के लिए पर्याप्त है। इसके बाद क्या होगा, ये कहना मुश्किल है। दरअसल नेहरू मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने ज्यादा रीएजेंट की मांग की थी। सिम्स भी बड़ा मेडिकल कॉलेज है और वहां भी रीएजेंट की जरूरत है। इसे देखते हुए जरूरत के हिसाब से रीएजेंट दिया गया है। सिम्स प्रबंधन के अनुसार उनके पास जून तक के लिए ही रीएजेंट उपलब्ध है। आगे की खरीदी के लिए कमिश्नर मेडिकल एजुकेशन से अनुमति मांगी गई है। दरअसल जब ग्लोबल टेंडर मंगाया जाता है तो दावा-आपत्ति की जरूरत भी पड़ती है।
ऐसे में मशीन सप्लाई करने वाली कंपनी ही टेंडर भरती है और रीएजेंट की सप्लाई करती है। पत्रिका की पड़ताल में पता चला है कि लगातार समस्याओं को उजागर करने के बाद ग्लोबल टेंडर के लिए कॉलेज प्रबंधन ने सीजीएमएससी व शासन से एनओसी मांगी थी। शासन व सीजीएमएससी ने आचार संहिता का हवाला देते हुए अभी एनओसी नहीं दी थी। कॉलेज प्रबंधन भी लंबे समय से रीएजेंट के मामले में चुप्पी साधे बैठा है। प्रोपराइटीज आइटम का हवाला देकर ग्लोबल टेंडर के लिए प्रयास भी नहीं किया जा रहा था। इसका टेंडर सीजीएमएससी ही करेगा, इस सोच में समस्या के समाधान के लिए प्रयास भी नहीं किया गया। इधर सीजीएमएससी की लेटलतीफी किसी से छिपी नहीं है। मरीजों को हो रही दिक्कतों पर भी दवा कॉर्पोरेशन के अधिकारी गंभीर नहीं है।
जो कंपनी मशीन बनाती है, वही रीएजेंट की सप्लाई करती है। इसे ही प्रोपराइटीज आइटम कहा जाता है। दूसरी कंपनी रीएजेंट की सप्लाई नहीं कर सकती, क्योंकि ये किसी काम का नहीं रहेगा? यानी दूसरी कंपनी का रीएजेंट काम ही नहीं करेगा।
Published on:
08 May 2024 02:13 pm
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