
CG Festival Blog: डॉ. अनिल कुमार शुक्ला/मनुष्य के जीवन में वर्तमान समय में धन दौलत यानि आर्थिक समृद्धि, सफाई यानि स्वच्छता और रोशनी यानि ऊर्जा का बहुत महत्व है। केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम योजनाएं आज इन्ही तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं। लेकिन आप हम सब इस बात से भली भांति परिचित हैं कि दिवाली यानि दीपावली त्यौहार का महत्व जो कि सनातन में परंपराओं से चला रहा है। इन्हीं तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं।
दीपावली पर्व को रोशनी का पर्व कहा जाता है। इस दिन हम दीपक की रोशनी से अपने घरों को रोशन करते हैं। इससे पहले हम अपने घरों की साफ सफाई करते हैं। दीवारों का रंग रोगन करते हैं, नई-नई वस्तुएं खरीदते हैं। अंत में हम धन की देवी मां लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर, धनवंतरी की पूजा करते हैं।
यह पूजा इस भाव के साथ की जाती है कि हमें धन दौलत की प्राप्ति हो यानि घर में आर्थिक समृद्धि आए। कहने का तात्पर्य यह है कि सनातन धर्म में इन बातों का ज्ञान परंपराओं से है। तभी तो दीवाली जैसे पर्व आज भी अस्तित्व में हैं। (CG Festival Blog) दीपावली को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं हैं, कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं, इनमें विद्वानों में मत भिन्नताएं भी हो सकती हैं लेकिन दिवाली या दीपावली एकमात्र ऐसा त्योहार है, जो समृद्धि और संस्कृति के बीच सेतु की भूमिका का निर्वहन करता है।
दरअसल मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि समृद्धि की यह आराधना संस्कृति के कारण ही की जाती है। इसे हम पौराणिक युग की गहरी सोच का परिणाम कह सकते हैं। क्योंकि इस पर्व के माध्यम से जीवन के विभिन्न अंगों को संस्कृति के माध्यम से जोड़कर एक संतुलन कायम किया गया है।
CG Festival Blog: आज के दौर में समृद्धि की व्याख्या करना कुछ कठिन सा महसूस हो रहा है। क्योंकि समृद्धि की गति और साधनों से जन्मी निरंकुशता संस्कृति को नकारने तक का काम करने लगी है। ऐसे में गंभीर सवाल उठना लाजमी है कि क्या समृद्धि, संस्कृति को नष्ट कर देगी? या फिर परंपरागत शक्ति के रूप में स्थापित संस्कार व संस्कृति को कुछ समय के लिए ग्रहण लग जाएगा? कई बार ऐसा महसूस होता है कि भौतिक समृद्धि की चकाचौंध में संस्कृति का दीया टिमटिमाने को मजबूर है।
लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समृद्धि तात्कालिक, अल्पकालीन या दीर्घकालीन हो सकती है। संस्कृति एक परंपरा के रूप में सतत प्रवाहमान है। समयानुसार परिवर्तन, संशोधन-संवर्धन उसका गुण है। समृद्धि के दिन निश्चत हो सकते हैं जबकि संस्कृति का प्रकाश पीढ़ियों और युगों तक फैलता रहता है।
यह बातें दीपावली के इस मौके पर इसलिए की जा रही हैं कि यही एक ऐसा पर्व है जिसके व्यापक स्वरूप में समृद्धि व संस्कृति, मनुष्य जीवन में सिक्के के दो पहलू के रूप में जीवंत बने रहते हैं। जो बीत गया उसकी याद दिलाते हैं। जो हो सकता है उसकी संभावनाओं के पंख फैलाते हैं।
संस्कार व संस्कृति एक धीमे-धीमे बहती नदी के सतत प्रवाह के समान हैं जो खुद तो पवित्र बना ही रहती है, साथ ही जहां तक भी उसकी बूंद रिसकर पहुंचती है वहां तक उसके गुण भाव पहुंचते रहते हैं। इस बहाव की धारा का टूटना या सिकुड़ना स्थापित सभ्यता को ही मरुस्थल बना सकता है। छिन्न भिन्न कर सकता है।
अराजकता की स्थिति पैदा कर सकता है। (CG Festival Blog) समृद्धि की कामना के साथ, समृद्धि की जगमगाहट और रोशनी को साथ रखकर मनाया जाने वाला दीपावली का त्योहार भी संस्कृति स्वरूपी साज-सज्जा, पूजा-प्रार्थना में ही आराधना के सुफल का विश्वास संजोए होता है। हमें आज ऐसी ही समृद्धि की आवश्यकता है जिसमें संस्कृति को नकारने का साहस न हो। इस नेक कार्य को दीपावली पर्व सदियों से करता आ रहा है।
Published on:
27 Oct 2024 12:45 pm
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