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छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोक रही अंग्रेजी, आजादी के 71 साल बाद भी ऐसी स्थिति

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोक रही अंग्रेजी, आजादी के 71 साल बाद भी ऐसी स्थिति

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छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोक रही अंग्रेजी, आजादी के 71 साल बाद भी ऐसी स्थिति

आवेश तिवारी@रायपुर. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस बात की चर्चा जोरों पर है कि जल्द ही राज्य के आधा दर्जन आदिवासी समुदायों को जनजाति का दर्जा मिल सकता है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने केंद्र को 13 आदिवासी समुदायों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव चार साल पहले से भेज रखा है।

छत्तीसगढ़ में चुनावी मौसम से पहले और बाद में भी यह सवाल बहुत कम किया जाता है और इसका जवाब भी बेहद कम मिलता है कि आखिरकार आजादी के 71 वर्षों बाद भी सभी वंचित आदिवासी समुदायों को जनजातियों की सूची में शामिल क्यों नहीं किया जा सका है? क्या वजह है कि कई आदिवासी समुदाय आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ पाने में असमर्थ हैं? इस सवाल का जवाब बेहद चौंकाने वाला है। ऐसा दरअसल इसलिए हो रहा है, क्योंकि आदिवासियों को अंग्रेजी बोलने और अंग्रेजी भाषा का उच्चारण करने नहीं आता। 2011 की जनगणना में बोलियों के आधार पर 1084 ऐसी जातियों की पहचान हुई थी जो आदिवासी समुदाय के थे, ऐसी 705 जनजातियों को तो सरकार से मान्यता मिली, लेकिन 379 जनजातियां इससे बाहर रही।

कैबिनेट के आदेश पर पेंच
दुखद यह भी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक सभी आदिवासी समुदायों की पहचान और उनको अनुसूचित जानजाति में शामिल करने को लेकर आजादी के बाद से ही गंभीर प्रयास नहीं किए गए है । रमन सरकार द्वारा पिछले वर्ष के अंत में अनुसूचित जनजाति के 22 जातियों के 86 अलग अलग उच्चारण और अनुसूचित जातियों की 5 जातियों के 19 उच्चारणों को मान्य करने का निर्णय ले तो लिया लेकिन यह निर्णय विवादों के घेरे में हैं। दरअसल कुछ जनजातीय समुदाय जो आरक्षण का लाभ ले रहे हैं उनका मानना है कि इस किस्म के निर्णय रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया के निर्देश पर संसद ले सकती है और इसके लिए बाकायदा अधिसूचना जारी करना आवश्यक है।

कितनी है जनजातियों की ताकत
छत्तीसगढ़ में बस्तर से लेकर सरगुजा तक कांग्रेस, बीजेपी समेत सभी राजनीतिक दलों की निगाहें आदिवासी वोट बैंक पर है राज्य की 90 में से 29 सीटें जनजातियों के लिए आरक्षित हैं वहीँ समूची आबादी में आदिवासियों का फैलाव जबरदस्त है। छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत 42 जाति समूह और अनुसूचित जाति के अंतर्गत 44 जाति समूह अधिसूचित किए गए हैं। प्रदेश की कुल आबादी में 32 फीसदी आदिवासी है अगर सभी आदिवासी समूहों को जनजातीय सूची में शामिल किया जाएगा तो राज्य में न सिर्फ अनुसूचित जनजाति की आबादी बढ़ेगी बल्कि चुनावी प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी भी बढ़ेगी केवल इतना ही नहीं उन्हें नौकरी और शिक्षा में आरक्षण का लाभ भी मिलेगा । कई जातियां ऐसी हैं जिन्हें अलग अलग करके दो बार मान्यता दे दी जिन जातियों को मान्यता दी भी गई उनमें भी जमीनी वास्तविकताओं की अनदेखी की गई है । कई को पिछड़े वर्ष में शामिल कर दिया गया। अगर यह सूरत बदलती है तो निश्चित तौर पर चुनावी राजनीति में आदिवासियों का हस्तक्षेप बढेगा।

इसलिए हुआ यह गड़बड़झाला
आदिवासी समुदायों को चुनावी राजनीति से वंचित इसलिए भी रहना पड़ा है क्योंकि जनजातियों को मान्यता दिए जाने को लेकर जो अधिसूचना जारी की जाती रही वो मूल रूप से अंग्रेजी में थी। यहां तक की हिन्दी अधिसूचना भी अंग्रेजी का अनुवाद थी। काबिलेगौर हैं कि जिन आदिवासी समूहों को मान्यता नहीं मिली है वो न तो आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं न ही उन्हें आरक्षण का कोई लाभ मिल सकता है। छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के दूसरे राज्यों में भी एक ही जनजाति समुदाय का नाम अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से बुलाया जाता है। नतीजा यह है कि एक ही समुदाय का होने के बावजूद जातीय उच्चारण में भिन्नता की वजह से उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।

निर्वाचन आयोग के नियमानुसार ही आरक्षण को लागू किया जाएगा। नि: संदेह जनजातियों के आरक्षण का निर्धारण एक क्लिष्ट विषय है।
सुब्रत साहू, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी

राज्य जनजाति आयोग को इस स्थिति और आदिवासियों के दर्द की पूरी जानकारी है। हमारी कोशिश है कि जो भी आदिवासी समूह मान्यता के लिए आगे आते हैं, उनके लिए तत्काल पहल की जाए।
जी.आर. राणा, अध्यक्ष राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग

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