
रायपुर। भाव अउ लय के लोकगीत के संग आत्मीय संबंध होथे। लोकगीत मन कोनो नियम म नइ बंधे राहय। देस, काल, परिस्थिति के मुताबिक वोमे बदलाव होवत रहिथे। लोकरूप अउ लोकसैली के परभाव गांवमन के खेलकूदमन म घलो परे हे।
छत्तीसगढ़ म कतकोन खेल बहुतेच लोकपरिय हावय। ये खेलमन म गीत, गांव के संस्करीति, परंपरा, रीत- रिवाज के बखान होथे। खेल खेलत समे गीत गाए के परंपरा सिरिफ छत्तीसगढ़ म हावय।
खेलावना : खेल-खेल म गीत गाए अउ खड़े-खड़े थिरके के भावभंगिया के नांव हे खेलावना। सावन-भादो म घनघोर घटा सोर मचाथे, तब लइकामन आनंद विभोर होके झूम उठथे।
'आले आले डालिया, पाके बुदलिया, फुगड़ी खेल राधा, फुगड़ी खेल।Ó
फुगड़ी : फुगड़ी म टोली, संख्या अउ खेल के समे तय नइ होवय। ऐमा जतके नोनीमन सकलाथें, वोतके झन खोलथें। फुगड़ी खेले के मन होइस त कोनो चउंरा, गांव के चौपाल म रम जथें। उकड़ू होके थिरकथें।
'फुगड़ी रे फून-फून,
फुगड़ी रे फून-फून।Ó
फुगड़ी खेलत एकझन नोनी ह गाथे।
'गोबर दे बछरू, गोबर दे।
चारों खूंट ल लीपन दे
चारों देरानी ल बइठन दे।
ऐला सुनके दूसर नोनी ह गीत गाथें।
'कचरा फेंके ल गेयेंव, एक बुंदेला पायेंव। सास-बहू ला खवायेंव, देवर ल बीजरायेंव।Ó
फुगड़ी ह गोठिया-बतियाय के माध्यम घलो हे। एक सखी ह दूसर सखीमन ल अपन मन के बात ल बताथे। त सखीमन घलो गीत गा के कहिथें।
'अपन खाये गूदा-गूदा, मोला देथे बीजा, ओ बीजा ल का करबो, रहि जाबो तीजा, तीजा के बिहान दिन, सरी सरी लुगरा।Ó
परंपरा ल भला कइसे भुला सकत हे। तीजा के उपास रहइया ल लुगरा मिलथे। भउजी ल ननद ल परेसान करथे। कपाट ल ओधा देथे। वोकर आंखी ले आंसू बोहाय बर धर लेथे। तब वोहा बिनती करत कहिथे-
'हेर दे भउजी कपाट के खीला,
चीऊं-चीऊं नरियाये,
मंजूर के पीला।Ó
फुगड़ी म सिकवा-सिकायत होथे त मान-मनौव्वल घलो होथे। सखी कहिथे- छोड़ रोवई-धोवई ल, चल फुगड़ी खेलबोन।
'एक गोड़ मा लाल भाजी, एक गोड़ मा कपूर
कतेक ला मानव मय देवर ससुर
फुगड़ी रे फुन.. फुन..।
Ó चिंगरी-बरबट्टी : ऐ खेल म घलो छुआ-छुऔल के महत्तम हे। लंगड़ी खेलत-खेलत छुआ-छुऔल होथे। टूरा अउ टूरी दूनों ऐ खेल ले खेल सकथें। खिलाड़ी हार जथे त वोला कहिथें- 'चिंगरी बरबट्टी, मानबती के दाई। मानबती के दाई, मुरर्रा लेबे ते लाई।Ó पताड़ी-मार : छत्तीसगढ़ के संस्करीति हमन ल सिखाथे के आलस ह मनखे के दुस्मन हे। खेल म तो फुरती देखावव। छुआ-छुऔल म बिलंब होही त पताड़ी-मार पड़ही। तभे तो कहे जाथे-'पताड़ी मार पडग़े, छुवइया गड़ी मरगे।Ó छुआ-छुऔल के एकठिन खेल म पानी अउ कुकरा के लेके बात घलो कहे गे हावय। 'कहां के पानी? बादर के पानी। कहां के पानी? नदिया के। कोन कोती लेबे? उत्ती-बूड़ती, रक्सहूं-भंडार।
काकर कुकरा? रामदसरथ के। कहां ले आइस? चंदाभीर। कोन चोर? फलाना चोर।Ó अटकन-बटकन : जुन्ना समे म नोनी मन घर-अंगना म बइठके ये खेल ल मजा से खेलत रहिन। 'अटकन-मटकल दही चटाका, लउहा-लाटा, बन के कांटा।
Published on:
08 May 2018 06:20 pm
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