
छत्तीसगढ़ के नीलकंठ 'मुक्तिबोध
छ त्तीसगढ़ राज्य के नीलकंठ के नाव ले जनैया परमुख कवि, आलोचक, निबन्धकार अउ कहानीकार हिंदी साहित्य जगत के वाद प्रगतिवाद, नई कविता के बीच के पुलिया सही काम करइया गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी साहित्य अउ छत्तीसगढ़ राज्य बर कोनो चिन्हारी के जरूरत नइये। मुक्तिबोध नाव ह वोकर पूरा साहित्यिक रचनामन के बोध करा देथे।
मुक्ति बोध जी के जन्म 13 नवम्बर 1917 के स्योरपुर ग्वालियर म होइस। सुरुआती पढ़ाई लिखाई उज्जैन म होय रिहिस। चार भाई म एक भाई सरतचन्द्र मराठी के बडज़न कवि होइस। थानेदार पिताजी के मन रिहिस कि बेटा पढ़-लिख के वकील बने। बड़े मुकदमा हाथ म लेके खूब पैसा कमाय अउ नाव घलो मोर ले जादा कमाए। माताजी सरल स्वभाव के किसान परिवार ईसागढ़ बुंदेलखंड के रिहिस।
माधवजी ल कईझन मन साहित्य संसार बर बरगद पेड़ के नाव घलो दिन। जेमे जादा सोचे-समझे के बात नइयेे। वोकर काव्य कला के एक अलगे रूप देखे बर मिलथे। वोकर कविता बड़ अद्भुत संकेत, चिन्हा, जिज्ञासा, दूरिया ले चिल्लात, कभु कान म चुपचाप बात कहत, कभु तरिया, कभु अंधियार कुवा, डरराय ल लाइक आवाज करत ऐसे अलगे ढंग के हावे। कवितामन ल घेरी-बेरी पढबे तभे समझ आही। पहली बेर म मुढ़ी के उप्पर ले भाग जहि। फेर एकदम गुड़ रहस्य ले भरे पड़े हे, ओइसने गद्य साहित्य के घलो बड़े संदेस ले समाहित हे।
मोर अच्छा भाग्य हे कि जेन राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज म मुक्तिबोध जी साठ के दसक म पढ़ाहात रिहिस। उही कालेज म मोला घलो पढ़े के मौका मिलिस अउ अब्बड़ गरब घलो होथे। त्रिवेनी परिसर म मुक्तिबोध के सुरता ल संजोय बर मूरति के स्थापना साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्सी, बलदेव प्रसाद मिश्र के संग विराजित कराये गे हे। जेकर ले कालेज के सोभा अउ बढ़ जाथे। निकट आगू म तीनोंझन कलमकार ल ठाड़े दिखथे।
मुक्तिबोध के परम संगवारी रिहिन प्रभाकर माचवे, नेमीचंद जैन, नरेस मेहता, भारतभूसन अग्रवाल, अज्ञेय जी। तार सप्तक के प्रकासन के भार अज्ञेय के ऊपर सौंप दिस। फेर, मूल रूप ले वोकरे हाथ बात रहय। हंस, जयहिंद, समता, नयाखुन जैसे पत्रिका म संपादक के भार घलो मुक्तिबोध के कंधा म रिहिस।मुक्तिबोध माखनलाल चतुर्वेदी, महादेवी वर्मा नजदीक अउ विदेसी कवि दस्तायवस्की, प्लाबेयर अउ गोर्की से सबले जादा प्रभावित रिहिस। वोकर कवितामन म गोर्की के छाप दिखथे।
17 फरवरी 1964 के मुक्तिबोध ल पक्छाघात होगे। सारा हिंदी साहित्य जगत के बड़े-बड़े कविमन दिन-रात वोकर सेवा म लग गे। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में भरती जादा दरा बिगड़े म दिल्ली के आल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट में भरती करिन। 8 महीना के कठिन लड़ई 11 सितम्बर 1964 के साहित्य संसार ले विदा हो जथे।
Published on:
12 Nov 2019 04:16 pm
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