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सिक्छा हमर पुरखामन के

समाज

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सिक्छा हमर पुरखामन के

सिक्छा हमर पुरखामन के

आज दुनिया भले कतको आधुनिक अउ समरिद्ध हो गे हे, फेर हमर पुरखामन के जिनगी जिए के ढंग ह आज के हिसाब ले जादा समरिद्ध अउ पढ़े- लिखे मनखेमन ले जादा गियानी रिहिन हें। हमर पुरखामन जब खेत जोते के बेरा नांगर चलात रइतिस अउ उही बेरा अगर कोनो बइला ह गोबर करे स्थिति म रहय त नांगर चलइय ल बंद कर दंय। बइला के गोबर करे बाद फेर नांगर चलांय। गाय-गरवामन बर अइस,न संवेदना हमर महान पुरखामन के मन म नानपन ले रहाय। जेला आज हमन अनपढ़ कहिथन। ये सब अभी 25-30 बछर पहिली तक होत रिहिस हे, फेर आज अइसन संवेदना नदा गे हे।
वो जमाना के देसी घीव ल अगर आजकाल के हिसाब ले किम्मत लगाही त वोहा अतना सुुद्ध राहत रिहिस की पच्चीस सौ रुपिया किलो तक बेचा जतिस। वो देसी घीव ल किसानमन ह बने काम के दिन म हर दू दिन बाद म आधा-आधा किलो घीव अपन बइलामन ल पियातिस।
टीटीरी नाम के चिरई जब अपन अंडा ल खेत म जमनतिस अउ वोला सेवय त नांगर चलाए के बेरा अगर कोनो टीटीरी चिरई ह चिल्लातिस त किसान ह वोकर अवाज ल सुन के समझ जावय अउ वोअंडा दे वाले भुइंया ल बिना जोते खाली छोड़ देवय। जबकि वो बेरा म आज जइसन आधुनिक सिक्छा नइ रिहिस। वो बेरा म सबझन आस्तिक राहंय। मंझनिया कन जब किसान के सुरताय के बेरा होवय त वोहा सबले पहिली बइलामन ल पानी पिया के चारा खवातिस, वोकर बाद ही अपन ह भात खातिस। ऐहा वोकरमन के रोज के नियम राहय।
बइला के मरत तक सेवा-जनत करे जाय
बइलामन ह जब बूढ़ा जतिस त वोला कसाईमन ल बेचई वो बेरा सामाजिक अपराध के गिनती म आवत रिहिस। बूढ़वा बइला कई बछर तक ठलहा बइठे चारा पगुरात राहय अउ किसान ह वोकर मरत तक ले वोकर सेवा करत राहंय। वोबेरा के बिगर पढ़े लिखे किसानमन के ये बिचार राहय की जेकर महतारी के बछरभर ले दूध-दही खाके अतका बड़ बाढ़े हंन अउ जेकर कमई खाए हंन, अब बूढ़तकाल म वोला कइसे छोड़ दन। कइसे कसाईमन ल दे दन काट के खाए बर। जब बइला मर जतिस त किसान ह फफक-फफक के रो डरतिस। किसान वोकर संग बिताए बेरा ल सुरता करतिस। हमन ल गरब हे हमर पुरखा अउ संस्करीति बर।