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मायाचारी छोड़ कर मन, वचन व काय को सरल बनाएं : अभिषेकजी

शास्त्र वाचन में अभिषेक ने कहा कि धर्म का तीसरा लक्षण है उत्तम आर्जव। ऋजु शब्द से आर्जव बनता है। जिसमें किसी प्रकार का छल नहीं, कपट नहीं, किसी प्रकार के धोखे देने की भावना नहीं। ऐसी जो आत्मा की शुद्ध परिणति है उसका नाम आर्जव है। ऋजुता का अर्थ है सरलता। सरलता के मायने हैं मन वचन काया की एकता। मन में जो विचार आया उसे वचन से कहा जाए और जो वचन से कहा जाए उसी के अनुसार कार्य की प्रवृत्ति की जाए। जब इन तीनों योग में विषमता आ जाती है, तब माया कहलाने लगती है।

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मायाचारी छोड़ कर मन, वचन व काय को सरल बनाएं : अभिषेकजी

मायाचारी छोड़ कर मन, वचन व काय को सरल बनाएं : अभिषेकजी

भाटापारा। श्री 1008 आदिनाथ नवग्रह पंच बालयती दिगंबर जैन मंदिर भाटापारा में पर्युषण पर्व दशलक्षण महापर्व बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। श्रीजी का मंगल अभिषेक प्रारंभ हुआ। सभी भक्तों ने अत्यंत भक्ति पूर्वक श्रीजी का मंगल अभिषेक महा मस्तकाभिषेक किया। शुक्रवार की मंगल सर्व विघ्न विनाशक शांति धारा का सौभाग्य आलोक मोदी, अभिषेक मोदी भाटापारा को प्राप्त हुआ। शांति धारा के बाद भगवान की मंगलमय आरती की गई। मंगल आरती के बाद श्रीदेव शास्त्र गुरु पूजा, सोलह कारण पूजा, पंच मेरु पूजा, दशलक्षण पूजा, सानंद संपन्न हुई।
शास्त्र वाचन में अभिषेक ने कहा कि धर्म का तीसरा लक्षण है उत्तम आर्जव। ऋजु शब्द से आर्जव बनता है। जिसमें किसी प्रकार का छल नहीं, कपट नहीं, किसी प्रकार के धोखे देने की भावना नहीं। ऐसी जो आत्मा की शुद्ध परिणति है उसका नाम आर्जव है। ऋजुता का अर्थ है सरलता। सरलता के मायने हैं मन वचन काया की एकता। मन में जो विचार आया उसे वचन से कहा जाए और जो वचन से कहा जाए उसी के अनुसार कार्य की प्रवृत्ति की जाए। जब इन तीनों योग में विषमता आ जाती है, तब माया कहलाने लगती है।
उन्होंने कहा कि मायाचारी व्यक्ति का व्यवहार सहज वसरल नहीं होता। वह सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ और ही है। मायाचारी व्यक्ति कभी सुख, शांति का अनुभव नहीं कर सकता। मायाचारी से हम दूसरों को ठगने का प्रयास में सारा जीवन खो रहे हैं, पर ध्यान रखना हम दूसरों को नहीं, स्वयं अपनी आत्मा को ही ठग रहे हैं। दूसरों को धोखा देकर हम भले ही आनंदित हो जाएं, अपने को चतुर मानने लगें, पर यह ध्यान रखना कि भले हम दूसरों को छले पर छाले तो हमारे अपनी आत्मा पर ही पड़े रहे। आज के युग में लोग धर्म के नाम पर भी कपट करने लगे हैंए।मंदिर के अंदर कुछ और और बाहर दूसरे रूप में ही रहते हैं। लेकिन गुरुदेव कहते हैं जब भी धर्म का काम हो, अपने अंदर की बात हो तो सीधे बन जाए। अब सीधे बन जाना आप अपनी आत्मा को धोखा नहीं दे सकते।
आर्जव धर्म को प्राप्त करने की प्रथम शर्त है अपने भीतर की समस्त जड़ता को, मन की सारी कुटिलता को, वक्रता को, हम हटा के सरल परिणामी बने। भोले भाले बच्चों के समान एकदम निष्कपट सरल बने। अंत में गुरुदेव कहते हैं कि यदि आर्जव धर्म प्राप्त करना चाहते हो तो अपने मन को अपने वश में करो अन्यथा मन जैसा नचाएंगे वैसा हमें नाचना पड़ेगा। इसकी बागडोर हमारे हाथ में होनी चाहिए। अत: मायाचारी छोड़, अपने मन, वचन. काय को सरल बनाएं।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से शोभा लाल जैन, नवीन कुमार, नितिन कुमार, नैतिक कुमार, भावना, गदिया, पंकज गदिया, संजय शील चंद जैन, निशि जैन, संदीप सनत कुमार जैन, प्रकाश, अनिल, आलोक आदि उपस्थित रहे।

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