
Cherchera 2022: दान का महापर्व छेरछेरा आज, जानिए इसकी पौराणिक मान्यता और महत्व
रायपुर. Cherchera 2022: सबसे बड़ा लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी सोमवार को राजधानी समेत पूरे प्रदेश में महादान के रूप में मनेगा। जितना हो सके, जो भी हो सके, एक दूसरे की मदद, सहयोग करने का संदेश यह पर्व देता है। कोरोनाकाल जैसे संकट के दौर में तो ये पर्व और अधिक प्रासंगिक हुआ है। जब अधिक से अधिक जरूरतमंदों की मदद में हाथ आगे बढ़ सके। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा के इस पर्व पर द्वार-द्वार छेरी के छेरा... छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहेरा की आवाज अपनी परंपरा और संस्कृति का आभास कराएगी। क्योंकि इसी बलबूते पर गांधी मैदान में सबसे पुराना कांग्रेस कमेटी का भवन इसी परंपरा से बना था।
पौष माह के पूर्णिमा तिथि पर यह पर्व धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मान्यता यही कि किसान परिवारों की कोठी धान से छलकती है, उसी में से कुछ दान करने का पर्व है पुन्नी छेरछेरा। जो कि पूरे छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाला दान का महापर्व, जब यहां हर छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब के भेद को करने का संदेश देता है।
विशेषता यह कि शरीफ की फसल घर में आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दिन गांव हो या शहर बुजुर्ग, युवा, बच्चे छेरछेरा का उत्सव मनाते हैं। नाचते-गाते टोलियां बाजारों कॉलोनियों और मोहल्लों में पहुंचती हैं। छेरछेरा उत्सव में छत्तीसगढ़ी पकवान चीला, ठेठरी, खुरमी जैसे पकवान बनाकर अपने ईष्टदेवता, ग्रामदेवता और धरती माता की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। ताकि जीवन में खुशहाल बनी रहे। जिस शकंभरी पूजा भी कहा जाता है।
थोड़ा फीका पड़ता जा रहा त्योहार
महामाया मंदिर के पंडित मनोज शुक्ला बताते हैं कि छेरछेरा के दिन लोग दान देने और अपने यहां आने वालों का इंतजार करते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे वह उत्सव कम होता जा रहा है। जबकि यह ऐसा त्योहार जो कि जीवन की सार्थकता दान में है। यह उत्सव कृषि प्रधान संस्कृति में दानशीलता की परंपरा को याद दिलाता है। मंशा यही कि निराश्रितों, जरूरतमंदों की अधिक से अधिक मदद हो सके।
यह है छेरछेरा की पौराणिक मान्यता
पंडित शुक्ल बताते हैं कि भगवान शिव भिक्षा मांगने पार्वती के घर गए थे। वह तिथि थी मौष महीने की पूर्णिमा। इसी मान्यता से छेरछेरा पर्व मनाया जाता है। जनमानस में प्रचलित कथा के अनुसार पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थी। उनमें एक परीक्षा यह भी थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के घर भिक्षा मांगने पहुंचे और स्वयं ही अपनी निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे विवाह करने के लिए इंकार कर दें। परंतु ऐसा दृढ़ संकल्प की माता पार्वती नहीं डिगीं। वही छेरछेरा के रूप में मनाने की परंपरा है।
Published on:
17 Jan 2022 11:56 am

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