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धूम्रपान से मुख्य नस हो गई जाम, पैर में भी बढ़ रहा था घाव, कृत्रिम नस लगाकर दी नई जिंदगी

अगर आप भी करते हैं धूम्रपान तो यह खबर आपके लिए। कहीं आपके शरीर में तो नहीं दिख रहे इस तरह के लक्षण।

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अगर आप भी करते हैं धूम्रपान तो यह खबर आपके लिए। कहीं आपके शरीर में तो नहीं दिख रहे इस तरह के लक्षण।

रायपुर. राजधानी के मेडिकल कॉलेज से संबद्ध आंबेडकर अस्पताल के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट (एसीआई) में एक और जटिल सर्जरी कर डॉक्टरों ने खैरागढ़ से आए 52 वर्षीय सुरेश का पैर कटने बचा लिया है। अधिक धूम्रपान से मरीज की मुख्य नस कमर के पास से जाम हो गई थी, जिससे दोनों पैरों में रक्त का संचरण नहीं हो रहा था।

इस वजह से सुरेश को दस वर्ष से पैर में दर्द की शिकायत थी, जबकि कुछ ही दिनों में छोटा सा घाव गैंगरीन में बदल गया और वह धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा था। इस पर कुछ दिनों तक मरीज ने कई निजी अस्पतालों में जांच कराई, तब उसे नस में ब्लॉक की जानकारी मिली।

इस पर वह कार्डियो वैस्कुलर सर्जन डॉ. के.के. साहू के पास पहुंचा, जहां उसका कलर डॉप्लर की सहायता से नस में ब्लॉक (एओर्टा इलियक ब्लाक) पाया गया। इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने मरीज का ऑपरेशन (एओर्टो बाई फीमोरल बाईपास) करते हुए कृत्रिम नस लगाई और उसका पैर कटने से बचा लिया। जिसके बाद मरीज अब स्वस्थ अवस्था में है और गुरुवार को उसे अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेजा जाएगा। डॉक्टरों की टीम में डॉ. साहू के साथ एनेस्थीसिया डॉ. ओ.पी. सुंदरानी और नर्सिंग स्टॉफ शामिल रहे।

मुंबई से मंगाया गया ग्राफ्ट
मरीज 12 फरवरी को अस्पताल में दर्द और घाव नहीं भरने की शिकायत लेकर आया था। सीटी एंजियोग्राफी की सहायता से पेट के पास (एब्डोमिनल एओर्टा) में जाम पाया गया। इस पर डॉक्टरों ने ऑपरेशन की योजना बनाई और इसके लिए आवश्यक कृत्रिम नस (वाई शेप्ड ग्राफ्ट) शहर में उपलब्ध नहीं होने पर मुंबई से मंगाया। जिसमें 36 हजार रुपए के खर्च के साथ दस दिन का समय लगा। मरीज का 4 मार्च को मरीज का ऑपरेशन कर 7.14 मिलीमीटर एवं 16 सेंटीमीटर लम्बाई के डेक्रॉन ग्रॉफ्ट लगाकर उसे जोड़ा गया।

हो सकता था डेथ ऑन टेबल
डॉ. साहू के मुताबिक ऑपरेशन काफी जटिल था, जिसमें हार्ट से सभी ऑर्गन और अंगों में रक्त का संचरण होता है। इससे 5 लीटर प्रति मिनट की रफ्तार से रक्त का प्रवाह होता है। जिसमें जरा सी भी चूक से महज 2 सेकंड में ही ऑपरेशन के टेबल पर ही मरीज की मौत हो सकती थी।

सावधानी बरतते हुए डॉक्टरों ने 4 घंटे के ऑपरेशन के दौरान मरीज को बेहोश कर पेट खोला और अंतडिय़ों को बाहर निकालाते हुए वैस्कुलर क्लैम से नस को आंशिक रूप से ब्लॉक किया और बायपास करते हुए कृत्रिम नस लगा दी।

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