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छत्तीसगढ़ी म ‘गीतांजलि’ के सुग्घर अनुवाद होय हे ‘भाखा के अंजोर’ किताब म

छत्तीसगढ़ी म लिखे गे ‘भाखा के अंजोर’ किताब ल पढ़त समे मोर मन म बिचार आइस के दुनिया के सरेस्ठ रचनामन के छत्तीसगढ़ी म अनुवाद के छेत्र म बहुतेच कम काम होय हे। इही सेती हमर राजभासा के बढ़वार बर अइसन अनुवादमन के अब्बड़ जरूरत हावय। सविता पाठकजी के किताब ‘भाखा के अंजोर’ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य म नोबल पुरस्कार मिले काव्य संग्रह ‘गीतांजलि’ के छत्तीसगढ़ी अनुवाद आय। ये दिसा म ऐहा बहुतेच बढिय़ा परयास हे।

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छत्तीसगढ़ी म ‘गीतांजलि’ के सुग्घर अनुवाद होय हे ‘भाखा के अंजोर’ किताब म

छत्तीसगढ़ी म ‘गीतांजलि’ के सुग्घर अनुवाद होय हे ‘भाखा के अंजोर’ किताब म

छत्तीसगढ़ी म लिखे गे ‘भाखा के अंजोर’ किताब ल पढ़त समे मोर मन म बिचार आइस के दुनिया के सरेस्ठ रचनामन के छत्तीसगढ़ी म अनुवाद के छेत्र म बहुतेच कम काम होय हे। इही सेती हमर राजभासा के बढ़वार बर अइसन अनुवादमन के अब्बड़ जरूरत हावय। सविता पाठकजी के किताब ‘भाखा के अंजोर’ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य म नोबल पुरस्कार मिले काव्य संग्रह ‘गीतांजलि’ के छत्तीसगढ़ी अनुवाद आय। ये दिसा म ऐहा बहुतेच बढिय़ा परयास हे।
लेखिका ह ये कवितामन के मरम म जाके भाव के गंभीरता अउ सुग्घरता दूनों ल छुवइया सुद्ध संस्करीतनिस्ट हिंदी अउ बंगला म परचलित सब्दमन के छत्तीसगढ़ी भासा म बड़ मेहनत ले अइसे अनुवाद करे हावय के रवींन्द्रनाथ ठाकुर के भावमन के सटीक परकासन हो सके अउ ये कवितामन के सारतत्व अनुवाद म आय जाए।
अनुवाद म छत्तीसगढ़ी भाखा के कतकोन सब्द हावंय जइसे- तरि, निहुरा, जम्मो, जुच्छा, किंजरत, लबारी, बरपेली, बियापे, कोजनी, एकमई, जुन्ना, अलमल, परछिन, हिरदे, भिनसरहा, पौंरी, घुरघुराना, छेवर, हरइया, फोकट, बइहाय, बिहनिया, बारिहय, हरू, दूरिहा, संकरी, कोनजनि, रद्दा, झींकत, पहागे, कखरो, फेर, छेंकके, दहरा, कंठा, बोहिके, बांचे-खोंचे, चेंदरा, जिनगी, बेरा, गुरतुर, जातरा, घलो, मढ़ाना, नंदाना, सकिहंव, बांही, गिंजरथस, छोटकन, धुररा, मेटदे, टघलाके, आगी अमरना अउ अब्बड़ कअकन सब्द।
अनुवाद के उदारहन देखव।
मेरा ह्रदय लबालब भरा हुआ है।
मोर ह्रदय हर टिप-टिप ले भरे हे।
वहां मेरे प्राणों को अपनी परितृप्ति से भर।
उहां मोर परान ला अपन पूरा अघाय भाव ले भर।
जल्दी करो प्रभु मुझे तोड़ दो विलंब ना करो।
जल्दी कर परभु मोला टोर ले अबेर झन कर।
हे पथिक ना जाने क्यों आज मेरे प्राण पूरित हो उठे हैं।
ऐ डहर चलइया कोजनि काबर आज मोर परान पूर उठे हे।
ललाट पर तेरे स्पर्श का आनंद लिया।
माथा ऊपर तोर हाथ के छुअन के आनंद लिएंव।
हमने कांस का गुच्छ तैयार किया है।
हमन कांस के मोंजरा तियार करे हन
मेरी चेतना हर्षित हो कमल की तरह खिल उठी है।
मोर चेतना हा खुस होके कंवल असन फूलगे हवय।
तेरा निर्मल अमृत निर्झर।
तोर परछिन अमरित झरना।
हे मेरे जीवन प्राण मेरा अंतर विकसित कर।
हे मोर जिनगी के परान मोर हिरदे ला बहुत बड़े बना।

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