22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नहीं रहे स्वतंत्रता संग्राम सेेनानी और पूर्व सांसद केयूर भूषण

स्वतंत्रता संग्राम सेेनानी और रायपुर के पूर्व सांसद केयूर भूषण का गुरुवार शाम निधन हो गया। केयूर भूषण पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे

2 min read
Google source verification
latest cg news

नहीं रहे स्वतंत्रता संग्राम सेेनानी और पूर्व सांसद केयूर भूषण

रायपुर . स्वतंत्रता संग्राम सेेनानी और रायपुर के पूर्व सांसद केयूर भूषण का गुरुवार शाम निधन हो गया। केयूर भूषण पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे, जिसकी वजह से वे अस्पताल में भर्ती थे, जहां उनका इलाज चल रहा था।

बतादें कि केयूर भूषण का जन्म 1 मार्च, 1928 दुर्ग जिला के ग्राम जाँता में हुआ। वे दो बार रायपुर से सांसद रहे चुके थे। पृथक छत्तीसगढ़ के आंदोलन में केयूर भूषण की महत्‍वपूर्ण भागीदारी रही। जानकारी के अनुसार केयर भूषण 80 - 90 के दशक में रायपुर के सांसद रहे। वे दो बार कांग्रेस के टिकट पर रायपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े।

छत्तीसगढ़ में देश भर के जाने-माने कलाकारों को एक मंच पर लाने के लिए केयूर भूषण ने अपना अहम योगदान दिया। उनके प्रयासों से रायगढ़ में चक्रधर समारोह प्रारंभ हुआ। इसके अलावा छत्तीसगढ़ी को बोली से राजभाषा बनाने के लिए भी केयूर भूषण ने लगातार संघर्ष किया। हालांकि सरकार ने अभी तक इस मामले में कोई भी ठोस निर्णय नहीं लिया है।

छत्तीसगढ़ी साहित्य में बनाई पहचान
केयूर भूषण ने छत्तीसगढ़ी साहित्य में भी अपनी अलग पहचान बनाई। इन्होंने सोना कैना (नाटक), मोंगरा (कहानी), बनिहार (गीत), कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास), लहर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह) इत्यादि की रचना की। इन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 में 9 माह की जेल एवं कुल चार साल जेल में काटे। ये किसान मजदूर आंदोलन से जुड़े।

केयूर भूषण को छत्तीसगढ़ी शासन का पहला पं. रविशंकर शुक्ल सदभावना पुरस्कार 2001 से सम्मानित किया गया।
राजनीति और समाजसेवा में छात्र अवस्था से ही कार्यरत हो जाने के कारण वे मिडिल स्कूल से आगे शिक्षा ग्रहण नहीं कर सके। उन्होंने कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी तथा सर्वोदय में कार्य किया और कई बार जेल गए।

आजादी की लड़ाई में अहम योगदान
केयूर भूषण के अंदर देशभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा हुआ था। 1942 के आंदोलन में वे तीन साल तक नजरबंद रहे। हुकूमत ने उन्हें विद्रोह के आरोप में गोली मारने का आदेश दे दिया था, लेकिन इस आदेश को उस समय के रायपुर कलक्टर आरके पाटिल ने मानने से इनकार कर दिया।