
गुब्बारे वाले की कहानी बताने के लिए रंग-बिरंगे बैलून के साथ गौर गोपालदास।
रायपुर. अक्सर आपने सुना होगा कि बच्चों को स्मार्ट फोन नहीं देना चाहिए। दें भी तो मॉनिटरिंग जरूर करें। लेकिन इंटरनेशनल मोटिवेशनल स्पीकर का नजरिया इस मामले में बिल्कुल अलग है। वे कहते हैं बच्चों को स्मार्ट फोन दें ताकि वे टेक्नोलॉजी से अपडेट रहें साथ बच्चों को भी सलाह दी कि आप इसे ट्राई और यूज करें। क्योंकि इसके एडिक्ट हुए तो अपॉर्चुनिटी हाथ से निकल जाएगी। वे नरदहा स्थित एनएच गोयल स्कूल में आयोजित एनुअल फंक्शन में बतौर चीफ गेस्ट बोल रहे थे। उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में विभिन्न मुद्राओं के साथ जीवन के कई ऐसे मैसेज दिए जिससे बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी सीख ले सकते हैं। छोटी-छोटी कहानी और उदाहरणों के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने बच्चों से कहा कि ज्यादा खाना, पानी पीना, एक्सरसाइज करना नुकसानदायक है ठीक ऐसे ही स्मार्ट फोन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल आपको लक्ष्य से भटका देगा।
विराट, मुकेश अंबानी जैसे लोग एटिट्यूड से पहुंचे ऊंचाई तक
गोपालदास ने कहा कि आजकल प्रोडक्ट तो अच्छा होना ही चाहिए उससे बेहतर उसकी पैकेजिंग शानदार हो। आप कितने भी बुद्धिमान हों, कितने भी स्मार्ट हों लेकिन एक मैजिक वर्ड के बिना ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाएंगे और वो है आपको एटिट्यूड। अब बात सिर्फ वैल्यू की नहीं बल्कि फेस वैल्यू की है। आपके पास कितना भी बड़ा हुनर क्यों न हो आगे वही बढ़ेगा जिसका एटिट्यूड बढिय़ा हो। इसे जीवन में उतार लिया तो वैसे ही कामयाब होंगे जैसे विराट कोहली, मुकेश अंबानी, दीपिका पादुकोण, स्टीव जॉब्स समेत वे सभी जो आज शिखर पर हैं।
रंग से नहीं गैस से उड़ता है गुब्बारा
कहानी के माध्यम से बताया कि एक बच्चा गुब्बारे वाले से पूछता है कि सर ये लाल गुब्बारा उड़ेगा न? हां बेटा, बैलूनमैन जवाब देता है। इसी तरह बच्चा हर रंगे के बैलुन के उडऩे पर सवाल पूछता है तब गुब्बारे वाला कहता है बेटा बैलून रंग देखकर नहीं उड़ता। उसमें गैस होती है जो उसे ऊपर लेकर जाती है। सबका रंग अलग है। हर किसी में कोई न कोई खासियत होती है। स्किल और नॉलेज तो दे सकते हैं लेकिन एटिट्यूड नहीं। इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी है कि एटिट्यूड डवलप करें।
कंपेरिजन न करें
अक्सर पैरेंट्स बच्चों से कहते हैं कि देख फलां कितना बढिय़ा माक्र्स लाया है। देख वो कितना पढ़ाई करता है क्या कभी ये कहा कि देख तेरे भाई-बहन का कितना अच्छा बिहेवियर है। जो दूसरे के पास है बजाय उसके हमारे पास क्या है यह देखना हम भूल जाते हैं। दूसरों को ध्यान देने की जरूरत ही क्या?
आपकी पसंद-नापसंद से कोई चीज बुरी नहीं हो जाती
कोई फल आपको पसंद नहीं, इसका मतलब ये नहीं कि वह फल खराब है। आपका टेस्ट जरूर अलग हो सकता है। इसी तरह आपके बच्चे भी अलग-अलग फल की तरह हैं। अपने फल पर फोकस करें फल मीठा होगा। बच्चों को वैसे ही रहने दीजिए वे जैसे हैं। प्रेशर नहीं डालिए। आप उसे आम बनने कह रहे हैं क्योंकि समाज में आप की की पूछपरख ज्यादा है। बच्चा कह रहा है कि मैं केला हूं। इस चीज को समझने के बजाय आप आम बनने के लिए थोप रहे हैं।
भगवान बोलेंगे बस कर पगले रुलाएगा क्या
उपवास को लेकर कहा कि हर कोई व्रत रखता है लेकिन आज जरूरत सोशल मीडिया के व्रत की है। जिसे देखो उसी में रमा रहता है। अगर हफ्ते में एक दिन भी आप गूगल, वाट्सऐप, ट्वीटर या इंस्टाग्राम का व्रत रख लेंगे तो उसी दिन भगवान धरती पे आकर कहेंगे बस कर पगले रुलाएगा क्या?
पहले स्वार्थी बनिए फिर दूसरों की मदद कर पाएंगे
जिंदगी आइसक्रीम की तरह है। पिघलने से पहले ही आनंद ले लो। क्योंकि हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी। छांव है कभी, कभी है धूप जिंदगी। हर पल यहां जी भर जियो, जो है समां कल हो न हो... लेकिन ये तो स्वार्थीपन हो गया। इसलिए जरूरी है कि मोमबत्ती की तरह बनें जिससे दूसरों की जिंदगी भी रौशन हो। लेकिन इन दोनों स्थिति से बेहतर है कि पहले थोड़ा स्वार्थी बनें। प्लेेन पर कहा जाता है कि पहले अपना ऑक्सीजन मॉस्क लगाएं तभी आप दूसरों के लगा सकेंगे। यही बात जीवन में लागू होती है।
Published on:
24 Dec 2019 04:04 pm

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