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रायपुर. छत्तीसगढ़ी भाषा को भी डिजिटल करने का कार्य किया जा रहा है। लोगों तक उन्हीं की भाषा में जानकारी पहुंचाने के लिए आईआईएससी द्वारा महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की गई है। छत्तीसगढ़ के पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला के शोध उपाधिधारक डा. हितेश कुमार का चयन एसोसिएट रिसर्च (छत्तीसगढ़ी) के पद पर किया गया है।
ज्ञान हो या शिक्षा, इसे कभी भी सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग में बाधक नहीं बनना चाहिए। प्रौद्योगिकी तभी सार्थक होती है जब वह उन लोगों को आसानी से उपलब्ध हो, जिन्हें इसकी जरुरत है। जब कोई अपनी जरुरत की जानकारी अपनी भाषा और उपभाषा में प्राप्त कर सकता है।
आईआईएससी ने इस तरह का परिवर्तन लाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है।
ये विचार डा. हितेश कुमार ने व्यक्त किए। डा. हितेश कुमार ने अपना शोध कार्य पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति डा. केशरी लाल वर्मा के निर्देशन में पूरा किया है। डा. हितेश राजभाषा छत्तीसगढ़ी के साथ ही रायगढ़, सरगुजा, बिलासपुर और कवर्धा क्षेत्र में बोली जानी वाली छत्तीसगढ़ी के लिए विभिन्न सहयोगियों के साथ कार्य कर रहे हैं।
आज गूगल, एलेक्सा, सिरी, कार्टाना आदि से हम चुटकियों में जो भी जानकारी चाहते हैं वह मिल जाती है किंतु जब इसी को स्थानीय भाषा में चाहते है तो बहुत ही ज्यादा कठिनाई होती है। छत्तीसगढ़ी भाषा भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरह से बोली जाती है।
संस्थान के इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रशांत कुमार घोष के नेतृत्व में एक शोध दल 9 भाषाएं जिनमें यथा बंगाली, हिंदी, भोजपुरी, मगधी, मैथिली, मराठी, तेलगु और कन्नड़ के साथ छत्तीसगढ़ी भाषा में वॉइस कमांड के जरिए लोगों तक सूचना पहुंचाने के आर्टिफिशियल इंडेलिजेंस पर आधारित तकनिक विकसित कर रह रहा है. इससे छत्तीसगढ़ियों की अपनी भाषा छत्तीसगढ़ी जल्द ही डिजिटल और ग्लोबल होने जा रही है.
Published on:
07 Jul 2022 12:14 pm
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