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गल्फ संकट: छत्तीसगढ़ के चावल निर्यात पर असर, 20 फीसदी कम होगा व्यापार

ईरान-अमरीका युद्ध से छत्तीसगढ़ का व्यापार भी प्रभावित हो रहा है। सबसे बड़ा असर चावल निर्यात पर पड़ा है। छत्तीसगढ़ से हर साल मिडिल ईस्ट और अफ्रीकन देशों में लगभग 30 लाख टन चावल का निर्यात होता है। युद्ध की वजह से 20 फीसदी निर्यात प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा स्पेशल स्टील, जुड़ी-बूटी से […]

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गल्फ संकट: छत्तीसगढ़ के चावल निर्यात पर असर, 20 फीसदी कम होगा व्यापार

गल्फ संकट: छत्तीसगढ़ के चावल निर्यात पर असर, 20 फीसदी कम होगा व्यापार

ईरान-अमरीका युद्ध से छत्तीसगढ़ का व्यापार भी प्रभावित हो रहा है। सबसे बड़ा असर चावल निर्यात पर पड़ा है। छत्तीसगढ़ से हर साल मिडिल ईस्ट और अफ्रीकन देशों में लगभग 30 लाख टन चावल का निर्यात होता है। युद्ध की वजह से 20 फीसदी निर्यात प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा स्पेशल स्टील, जुड़ी-बूटी से बने हर्बल उत्पाद और बस्तर आर्ट के व्यापार पर भी सीधा असर हुआ है। हालात यह है कि युद्ध की वजह से कई टन चावल वाइज़ैक पोर्ट में अटका हुआ है। इसके अलावा मांग के आधार पर छत्तीसगढ़ से फल-सब्जी भी गल्फ कंट्री में भेजी जाती रही है। इस बार उनकी मांग नहीं होने की वजह से स्थानीय बाजार में सस्ती कीमत पर फल-सब्जी की बिक्री हो रही है।

स्टील, जड़ी-बूटी, बस्तर आर्ट जैसे उत्पाद पर भी पड़ा प्रभाव

एक्सपोर्ट काउंसलर पवन कुमार ठाकुर का कहना है, छत्तीसगढ़ का चावल मिडिल ईस्ट में कम और अफ्रीकन देशों में ज्यादा जाता है। बस्तर के कुछ बड़े कारोबारी सीधे दुबई चावल का निर्यात करते हैं। वहां उनके दफ्तर भी है, लेकिन इस बार युद्ध की वजह से परिस्थितियां बदली हुई हैं। वहीं व्यापारियों का कहना है कि बंदरगाह में चावल के डंप होने की आशंका के चलते राइस मिलर्स चावल भेजने से परहेज कर रहे हैं। हमले की आशंका को देखते हुए अधिकांश राइस मिलर्स जोखिम नहीं उठाना चाह रहे हैं। बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ से हर साल 10500 करोड रुपए का लगभग 30 लाख टन चावल का निर्यात होता है। हालांकि युद्ध की वजह से केवल 20 फीसदी चावल का निर्यात प्रभावित होगा।

कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं

चावल का निर्यात प्रभावित होने के बाद भी स्थानीय बाजार में चावल की कीमतों में कोई बड़ा फर्क नहीं आया है। अनाज व्यापारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में खासकर दुबराज, एचएमटी चावल की कीमतों को कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। हालांकि मार्केट में नए चावल की आवक होने के बाद 3 से 5 रुपए प्रति किलो तक कीमत कम हुई है।
इस युद्ध ने व्यापारियों को चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों का कहना है कि उनका सौदा पहले हुआ था। अब पेमाल ढुलाई का भाड़ा भी बढ़ गया है। शिपिंग लागत में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जहां प्रति कंटेनर का किराया 2,000 डॉलर से बढ़कर 9,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, शिपिंग कंपनियों द्वारा प्रति कंटेनर 2,000 से 2,500 डॉलर का वॉर टैरिफ भी लगाया जा रहा है, जो चावल की लागत में 8 से 10 रुपए प्रति किलोग्राम का अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।

पारंपरिक उत्पाद पर भी असर

छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर स्टील का उत्पादन भी होता है। मिडिल ईस्ट में कम और अफ्रीकन देशों में 10 करोड़ का करीब 12500 टन स्पेशल स्टील का निर्यात होता है। इसके अलावा 100 करोड रुपए का सिल्क कोसा, जड़ी बूटी का हर्बल प्रोडक्ट और बस्तर आर्ट का 100 करोड रुपए के सामान का निर्यात होता है। युद्ध के हालात की वजह से पारंपरिक उत्पाद पर भी असर दिखाई दे रहा है।