
जगदलपुर। आजादी के गुमनाम नायक थे गुण्डाधूर। वीर गुण्डाधूर का जन्म बस्तर के नेतानार गाँव में हुआ था। तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने बैजनाथ पण्डा नाम के एक व्यक्ति को बस्तर का दीवान नियुक्त किया था। दीवान बैजनाथ पण्डा आदिवासियों का शोषण करता और उन पर अत्याचार करता था.बस्तर के लोग उसके अत्याचार से त्रस्त थे।
बस्तर के अधिकांश लोगों की आजीविका वन और वनोपज पर आधारित थी। वनोपज से ही वे अपना जीवनयापन करते थे। दीवान बैजनाथ पंडा की नीतियों से वनवासी अपनी आवश्यकता की छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए भी तरसने लगे.थे। जंगल से दातौन और पत्तियाँ तक तोड़ने के लिए भी उन्हें सरकारी अनुमति लेनी पड़ती। आदिवासियों से बेगार भी ली जा रहा थी। शराब ठेकेदार लोगों का शोषण करते थे। जनता में असंतोष पनपने लगा। सन 1909 ई. में बस्तर की जनता ने इनके साथ मिलकर इंद्रावती नदी के तट पर एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया।
हाथों में धनुष, बाण और फरसा लिए हजारों लोग इसमें शामिल हुए। इस सम्मेलन में सबने यह संकल्प लिया कि वे दीवान और अंग्रेजों के दमन व अत्याचार के विरुध्द संघर्ष करेंगे। युवक गुण्डाधूर को नेता चुना गया. गुण्डाधूर का असली नाम सोमारू था।
आधुनिक हथियार का मुकाबला तीर- धनुष से
गुण्डाधूर ने विद्रोह का नेतृत्व करने अपना संगठन बनाया। विद्रोह करने का संदेश आम की टहनियों में मिर्च बाँधकर गाँव-गाँव में भेजा जाता था। स्थानीय लोग इसे ‘डारामिरी’ कहते और बड़े उत्साह से उसका स्वागत करते. अल्प समय में ही हजारों लोग ‘भूमकाल आंदोलन’ से जुड़ गए। उनकी योजना में अंग्रेजों के संचार साधनों को नष्ट करना, सड़कों पर बाधाएँ खड़ी करना, थानों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों को लूटना और उनमें आग लगाना शामिल था। अंग्रेज सरकार ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए मेजर गेयर और डी बेरट को 500 सशस्त्र सैनिकों के साथ बस्तर भेजा। गुण्डाधूर ने मूरतसिंह बख्शी, बालाप्रसाद नाजिर, वीरसिंह बेदार, सुवर्ण कुँवर तथा लाल कालेन्द्र सिंह के सहयोग से विद्रोह संचालन किया। आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज सैनिकों का इन वनवासियों ने अपने डण्डा, भाला, तीर, तलवार और फरसा से जमकर मुकाबला किया। सैकड़ों क्रांतिकारी तथा अंग्रेज सैनिक मारे गए। मई सन 1910 ई. तक यह विद्रोह अंग्रेजों द्वारा क्रूरतापूर्वक कुचल दिया गया। उत्तर से दक्षिण 136 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम 95 किलोमीटर का बस्तर क्षेत्र इस उथल-पुथल से प्रभावित था।
विश्वासघात की वजह से काटनी पडी गुमनामी
गुण्डाधूर ने पुन: अपने सहयोगियों को एकत्रित कर अलनार में अंग्रेजों से मुकाबला किया। सोनू माँझी के विश्वासघात करने पर उनके कई साथी मारे तथा पकड़े बाद में उन्हें फाँसी दे दी गई। गुण्डाधूर किसी तरह से बच निकले। अंग्रेजों ने बस्तर का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन अंत तक गुण्डाधूर का पता नहीं लगा सके। जनश्रुतियों तथा गीतों में गुण्डाधूर की वीरता का वर्णन मिलता है। वे धुरवा जनजाति के थे। आज भी नेतानार में उनका परिवार बसा हुआ है। शहर के बीचों बीच भी शहीद गुंडाधुर की याद में स्मारक बनाया गया है।
Published on:
15 Aug 2022 05:48 pm
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