
कला महज मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि उसमें उपदेश भी होना चाहिए
रायपुर/ ताबीर हुसैन. आज के बच्चे बहुत होशियार हैं। वे कला को खूब समझते हैं। इसलिए शास्त्रीय संगीत-नृत्य या ललित कलाओं का कभी अंत हो नहीं सकता। हाँ ये जरूर है कि इसमें नए प्रयोग होते रहेंगे। वैसे भी कला महज मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि उसमें उपदेश भी होना चाहिए। यह कहा देश-विदेश में भरतनाट्यम की प्रस्तुति दे चुके कलाकार प्रेमचंद होम्बल ने। वे एक निजी कार्य के चलते रायपुर आए थे। होम्बल ने कहा, नई पीढ़ी क्लासिक डांस में नए प्रयोग कर रही है, इसमें कुछ अच्छे तो कुछ मध्यम स्तर के होते हैं। प्रयोग करते वक्त बहुत ध्यान रखना होता है। जब अनुभव होने लगता है तो वे उनमें सुधार भी आने लगता है। जब नाट्य की उत्पत्ति हुई या रूपक का आगमन हुआ उसमें सबसे बड़ी चीज यह थी कि ब्रह्मा से निवेदन था- ऐसी विद्या,ऐसा निर्माण या ऐसा खेल बनाइए जो लोगों को मनोरंजन के साथ शिक्षा दे।
जहां नेम-फेम, वहां बढऩे लगते हैं युवा
एक सवाल के जवाब में होम्बल ने कहा कि युवा उस तरफ बढऩा चाहते हैं जहां उन्हें नेम औऱ फेम मिले। इसलिए कई बार वे शास्त्रीय संगीत की गरिमा तोड़ देते हैं। मैं ये नहीं कहूंगा कि उनकी ट्रेनिंग प्रॉपर नहीं हुई है। सब कुछ सही होने के बावजूद वे जल्दी मंजिल हासिल करने रास्ते बदल देते हैं।
नाट्यशास्त्र को लेकर हौव्वा
एनएसडी में थिएटर वर्कशॉप में मेरा जाना होता है। वहां मैं आंगिक अभिनय या इससे जुड़ी कोई दूसरी चीज सिखाता हूँ तो पाता हूँ कि आज के बच्चे कितनी गम्भीरता से चीजों को लेते हैं। नाट्यशास्त्र को लेकर जो हौव्वा खड़ा किया गया है, उतना है नहीं। इसे समझने का प्रयास करना होगा। इसे हम मॉडर्न टर्म के साथ जोड़ भी सकते हैं।
संस्कृत में उच्चारण पर परिश्रम
संस्कृत नाट्य रूपकों के प्रयोग के दौरान मैंने पाया कि युवाओं के लिए संस्कृत में उच्चारण पर प्रयोग करना होता है। इस भाषा के उच्चारण में विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। बच्चे मेहनत कर भी रहे हैं। इसके लिए मैं युवाओं से अभ्यास कराता हूँ, और वे अच्छी संस्कृत बोलने भी लगते हैं। वैसे भी जरूरी नहीं कि नाट्य रूपकों के लिए युवाओं को संस्कृत आए। ये तो सिखाने वाले पर निर्भर करता है कि वे किस तरह समझाते या बताते हैं।
आधे घण्टे तक बजती रहीं तालियां
हमने रशिया में आयोजित फेस्टिवल इंडिया में विज्ञान शाकुन्तलम की प्रस्तुति दी थी। वहां के लोग संस्कृत को पूरी तरह समझते नहीं थे लेकिन शांति के साथ पूरा कार्यक्रम देखा। प्रोग्राम खत्म होने के बाद लगभग आधा घण्टा हम सभी स्टेज पर खड़े रहे और तालियां बजती रहीं।
कौन हैं प्रेमचंद होम्बल
जीवन वृत्त: प्रेमचन्द होम्बल का जन्म 24 मार्च 1952, नृत्य को समर्पित परिवार में हुआ। माता गिरिजा देवी होम्बल एवं पिता स्व. शंकर होम्बल के सानिध्य में बाल्यावस्था से ही आपकी नृत्य शिक्षा प्रारम्भ हुई। भारत सरकार द्वारा प्रदत्त छात्रवृत्ति के अंतर्गत भरतनाट्यम् का गहन प्रशिक्षण पद्मभूषण गुरु स्व. रुक्मिणी देवी अरुण्डेल द्वारा संचालित कलाक्षेत्र चेन्नई से प्राप्त किया। भरतनाट्यम् नृत्य में स्नातकोत्तर की उपाधि इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। सन् 1981 में संगीत एवं मंच कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के नृत्य विभाग में शिक्षण आरम्भ किया। निरन्तर 36 वर्ष सेवा कर सन् 2017 में एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त हुए। आपने अपने सेवाकाल में 2010 से 2016 तक नृत्य विभागाध्यक्ष के पद पर भी कार्य किया।
प्रस्तुतियां: आपने देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर नृत्य की सफल प्रस्तुतियाँ दीं हैं, जिनमें प्रमुख हैं- श्रीलंका,थाईलैण्ड, फिनलैण्ड, अमेरिका, सोवियत संघ, नेपाल, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता,विशाखापट्टनम्, चेन्नई, बैंगलोर, भोपाल, इन्दौर, उज्जैन, ग्वालियर, लखनऊ, इलाहाबाद, जयपुर इत्यादि।
कार्यशाला एवं व्याख्यान: देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं में नृत्य एवं नाट्य की कार्यशालाओं में प्रशिक्षण दिया है, जिनमें प्रमुख हैं- कालिदास अकादमी उज्जैन, उत्तर-मध्य सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद द्वारा गोरखपुर,पटना,लखनऊ में, भरत कॉलेज आफ आर्ट एण्ड कल्चर, मुम्बई, कलापद्म डांस अकादमी, शिकागो(अमेरिका), इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़), विजुअल एण्ड परफॉर्मिंग आर्ट्स यूनिवर्सिटी, कोलम्बो (श्रीलंका), अयुत्थ्या यूनिवर्सिटी, थाईलैण्ड, भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी इत्यादि। साथ ही आपने अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं में व्याख्यान प्रदर्शन किए हैं।
निर्देशन: आपने कई नृत्य रूपक एवं संस्कृत नाटकों का निर्देशन एवं उनमें अभिनय किया है। जिनमें प्रमुख नृत्य-रूपक हैं- त्रिपथगा, रणचण्डी, जातकम्, रास-गोविन्दम्, सारनाथ, उमा-परिणयम्, गाथा महामना की, स्वाभिमान( डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर), कादम्बरी, महिषासुर मर्दिनी इत्यादि। प्रमुख संस्कृत नाटक हैं- दूतवाक्यम्, वेणी-संहार, उरुभंगम्, कर्णभारम्, मालविकाग्निमित्रम्, पांचरात्रम्, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् इत्यादि।
सम्मान: सिंगार मणि, ( सुर सिंगार संसद मुम्बई), अवन्तिका नेशनल ह्यूमेनिटी ( अवन्तिका ग्रुप, नई दिल्ली), नवरस संगीत वाचस्पति ( नव साधना कला केन्द्र, तरना, वाराणसी), उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी (लखनऊ), द्वारा प्राप्त सम्मान, नृत्य कला निधि (जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वरूपानन्द सरस्वती द्वारकापीठ) शिरोमणि (इन्टरनेशनल एसो. मदर इंडिया क्लब एवं ग्लोबल संगठन), शिक्षण सम्मान (रोटरी क्लब, वाराणसी) आचार्य श्रेष्ठ सम्मान (हिन्दुस्तान आर्ट एण्ड म्यूजिक सोसायटी भिलाई), नृत्य शिरोमणि( नृत्यांजलि कला अकादमी जबलपुर)।
Published on:
06 Jul 2021 04:21 pm
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