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सरोवर को न बनाओ गटर

सरोवर व नदियों की हालत हो रही खराब

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सरोवर को न बनाओ गटर

जल प्रदूषण की समस्या गंभीर हो गई है। यह दुर्भाग्य है कि इस दिशा में सिर्फ बातें होती है, काम नहीं। जहां का पानी पीकर हमारी जिंदगी चलती है, उसी जलस्रोत को गंदा करने में हम पीछे नहीं है। दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन हो चुका है, पर नदी और तालाबों में पड़े अवशेष सरकारी तंत्र की उदासीनता को उजागर कर रहा है। लोग भी कितने जिम्मेदार हैं यह भी अवशेषों को देखकर पता लग रहा है। प्रतिमा विसर्जन के लिए नेशनल ट्रिब्यूनल ने बाकायदा गाइड लाइन जारी किया है। स्थानीय निकायों व स्थानीय प्रशासन को प्रतिमा विसर्जन के लिए कुंड बनाने का सुझाव दिया है। इस पर अमल नहीं होने से हालत बदतर होती जा रही है। प्रतिमा विसर्जन को लेकर कुछ लोग इसे धर्म से जोड़कर किसी तरह की पाबंदी का विरोध करते हैं। उनका तर्क होता है कि आखिर हिंदू तीज त्योहारों पर ही ऐसी बातें क्यों होती है। ऐसा कहने वालों को यह जान लेना चाहिए कि पूर्वजों ने जल को देवता का दर्ज दिया है। देवता की हम पूजा करते हैं। फिर जिसे देवता मानते हैं उसे गंदा कैसे कर सकते हैं। यह सोचना होगा कि पूर्वजों ने हमारे लिए सुंदर तालाब और सरोवर छोड़ा है। तकि हमें पानी के लिए तरसना न पड़े। और हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोडऩा चाहते हैं? क्या यही चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी साफ पानी के लिए तरसे? अगर नहीं, तो हमें अभी से सचेत होना पड़ेगा। पहले राजा महाराजा लोगों के हित में कुआं और तालाब खुदवाते थे। उसकी देखभाल करते थे। क्योंकि, वे पानी का मोल जानते थे। सैंकड़ों साल पहले कवि रहीम ने कविता लिखा थी, रहिमन पानी राखिए....बिन पानी सब सून। सैंकड़ों साल पहले लिखी गई यह कविता आज पहले से भी ज्यादा प्रांसंगिक है।
सरकार ने सरोवर धरोहर योजना व शुरू की थी। नदियों को बचाने भी प्लान बनाया था। लेकिन, इन योजनाओं में करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद सरोवर व नदियों की हालत सुधरने की बजाय और खराब हो गई है। दुर्ग में शिवनाथ नदी को बचाने के लिए एक संस्था जागरुकता अभियान चला रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए की इस तरह के आयोजन से लोगों में जागरुकता आएगी। इसी तरह लोगों के साथ सरकारी तंत्र को भी जागाने जरूरी है।