
आज भी बेटे के इस बात को याद कर गर्व होता है 'मां तेरा लाल हूं, बड़ा काम करके आऊंगा
रायपुर. कारगिल के द्रास सेक्टर में टाइगर हिल से 4 किलोमीटर आगे सीमा रेखा के पास लांस नायक कौशल यादव 25 सिपाहियों का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी टीम ने आतंकवादियों की रात में ही घेराबंदी कर ली थी। दुश्मनों की तादाद तकरीबन 160 थी। 25 जुलाई 1999 को सुबह 8 बजे दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। तब 25 जवानों ने 130 दुश्मनों का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। उसके बाद बचे सिर्फ 30 दुश्मन। 2 घंटे की लड़ाई के बाद सुबह 10 बजे कौशल यादव और दुश्मनों के बीच काफी नजदीक से गोलाबारी हुई। इस बीच एक गोली कौशल के कंधे पर लगी। लेकिन वे बहादुरी से डटे रहे। घायल कौशल को बचाया नहीं जा सका। उनकी मां धनवंता देवी को बेटे की वह बात याद आती है, जब 30 मई को छुट्टियों में घर आने पर उसने कहा था कि 'मां तेरा लाल हूं, बड़ा काम करके आऊंगा।
26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।
इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है।
इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।
Updated on:
26 Jul 2018 01:51 pm
Published on:
26 Jul 2018 01:31 pm

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