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मौसी की तलाश में मुंबई से छत्तीसगढ़ पहुंचे लापतागंज के लल्लनजी

खैरागढ़ जाकर पूछा हालचाल, आशीर्वाद लेकर लौटे

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मौसी की तलाश में मुंबई से छत्तीसगढ़ पहुंचे लापतागंज के लल्लनजी

खैरागढ़ में अपनी मौसी के साथ अभिनेता राकेश श्रीवास्तव।

ताबीर हुसैन @ रायपुर. आपने लापतांगज के लल्लनजी यानी राकेश श्रीवास्तव को हमेशा हंसते-हंसाते देखा होगा। आज उनका इमोशनल अवतार देख लीजिए। दरअसल वे अपनी मौसी की तलाश में मुंबई से छत्तीसगढ़ पहुंचे। जब मौसी से मिले तो वे भावुक हो गए। आंखों में खुशी के आसुंओं की चमक थी। मौसी खैरागढ़ में रहती हैं। वापसी के वक्त वे पत्रिका ऑफिस भी आए। यहां उन्होंने हमसे ढेर सारी बातें की। पेश है उसके संपादित अंश। राकेश ने बताया कि 7 अप्रैल को अभिषेक बच्चन अभिनीत दसवीं रिलीज हो रही है। उसमें उनका किरदार लालालाजपत राय का है। वे कहते हैं मेरा कभी सपना था कि कोई बॉयोपिक रोल करूं जो अब जाकर पूरा हुआ। राकेश ने कहा कि एक्टर अपने आसपास की जिंदगी से ही कैरेक्टर को लाता है। इसलिए उसमें ऑब्जर्वेशन का गुण होना जरूरी है। लापतागंज में लल्लनजी का डायलॉग हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं...हर किसी के जुबान पर था। लेकिन उसमें लल्लनजी की जो हरकतें थी वह मैंने अपने दूर के फूफा से ही से एडॉप्ट की थी। इतना ही नहीं छोटी टाई वाला आइडिया भी मेरा अपना था। मैंने डायरेक्टर से कहा कि एक हफ्ता पहनने दो। चैनल वालों ने भी कहा कि छोटी ही क्यों। लेकिन बाद में उसी छोटी टाई को पूरी दुनिया ने पांच साल देखा। मेरे पास चाइना से फोन आया कि यहां के लोग वैसी टाई चाह रहे हैं। मैंने कहा कि कोई दिक्कत नहीं बस एक टाई के पीछे एक रुपए रायल्टी लगेगी।

चाचा पहना करते थे छोटी टाई

हमारे यहां लोग सूट कब पहनते हैं? शादियों में। उनमें से कई कब पहनते हैं अपने शादियों के। कई ऐसे होते हैं जिन्हें टाई बांधने भी नहीं आती। मेरे चाचा हर शादियों में सूट और टाई पहना करते थे। मैंने सोचा कि उनकी टाई धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है। मैंने जानना चाहा तो पता चला कि उन्हें बांधने नहीं आती। वे टाई को उतारकर वैसे ही टांग दिया करते थे और धोते भी वैसे ही थे।

रंगमंच से शुरुआत हुई, बतौर दर्शक आज भी नहीं छोड़ा

मैं लखनऊ से हूं। जब मैंने पिता से कहा कि मैं अभिनेता बनना चाहता हूं तो उन्होंने बस यही बात कही कि जो भी करना है प्रॉपर तैयारी से करो। मैंने भारतेंदु नाट्य अकादमी ज्वाइन की। वहां पढ़ाने भी लगा। बाद में मुझे लगा कि मैं किस चीज के लिए आया हूं। भीतर से आवाज आई एक्टर बनने। तब मैंने पढ़ाना छोड़ मुंबई का रुख किया। मेरी शुरुआत रंगमंच से हुई। वह आज भी मेरी भीतर है। जब टीवी में डेली सोप होने लगे तो मुझे थिएटर के लिए समय नहीं मिलने लगा। मैं आज भी थिएटर देखता हूं। बतौर दर्शक मैंने रंगमंच छोड़ा नहीं है।

आज भी ऑडिशन में रिजेक्ट होता हूं

एक समय ऐसा भी था जब मुझे ऑडिशन की जरूरत नहीं पड़ती थी लेकिन ओटीटी के दौर में ऑडिशन देना होता है और मैं रिजेक्ट भी होता हूं। लेकिन इसे मैं इट्स ओके कहता हूं। हां लेकिन उसके बाद रेट और शेड्यूल मेरे हिसाब से होना चाहिए।

प्रमुख शोज और फिल्में

टीवी- देख भाई देख, अमरावती की कहानियां, फर्ज, सोनी परी, ऑफिस-ऑफिस, बड़े मियां-छोटे मियां, श्रीशीफर्शीलाल, राजा की आएगी बारात, बाबा ऐसो वर ढूढों, संविधान समेत कई अन्य। फिल्म: एक लड़का-एक लड़की, सफारी, आगाज, सरदारनी बेगम, नेताजी द लॉस्ट हीरो, रोड टू संगम, सन ऑफ सरदार, तलाश, वाह ताज वाह।