
समाज सुधारक अउ समानता के परतीक ‘कबीर’
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताए। ए जग परसिध दोहा ल कोन नइ जानय। ऐला पढ़तेच ऐकर कहइया कबीरदासजी के सुरता ह आ जाथे। कबीरदास एक अइसन मनखे रहाय जेहा अपन अमरित भाखा ले मनखेमन म गियान के अंजोर बिगराइस अउ संत कहाइस।
संत कबीरदास के जनम ह कासी के एकठन गांव लहरतारा म जेठ प़ुन्नी के दिन होइस। तब ले हर बछर जेठ पुन्नी के दिन उंकर जयंती मनाथे। कबीरदास ह जुलाहा रिहिस। कपड़ा बनाये अउ बेचय। अपन काम म बिसवास कर,े काम ल महत्तम दे। कबीरदास पढ़े-लिखे नइ रिहिस। वोहा कहाय घलो-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ
पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का
पढ़े सो पंडित होय।
पोथी पुरान कतको पढ़व जब तक मनखे के परति परेम भाव नइ हे, कोई मतलब नइये। कबीरदासजी ह निडर होके समाज के अंधबिसवास अउ मूरति पूजा के विरोध करे। हिंदू-मुस्लिम के मतभेद ल मिटाय बर अबड़ कोसिस करय।
माला फेरत जुग गया
गया ना मन का फेर।
करका मन का डारिके
मन का, मन का फेर।
केहे के मतलब माला गिने ले, फेरे ले भगवान नइ मिले। अपन मन ले करोध, अहंकार ल मिटाय के कोसिस करव। मन मैला और तन को धोते। कतको नहाव, कतक़ो सफई करो जब तक मन म छल पट रहि कोऩो मतलब नइये। तेकर सेती अपन अंतस ल साफ करो। बड़े बने ले कुछु नइ होवय, बड़प्पन दिखाना, मनखेमन म भाईचारा अउ सुख- दुख म सामल होय, दूसर के मदद करे, सुवारथी नइ बने उही बड़े मनखे हरय।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ
जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं
फल लागे अति दूर।
कबीरदासदास ह जो भी कहाय वोकर चेला ह लिखे। पाछु कबीरदास के केहे गे बोल ह साखी, बीजक अउ दोहा कहाइस। निरगुन भगति ल माने कबीरदास ह। जिनगी अउ मौत म मनखे उलझ के परमातमा ल भुला जाथे, ऐकर तुलना कबीरदा जी ह जाता ले करे ह।
चाकी देख के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में
साबुत बचा ना कोय।
Published on:
13 Jun 2022 04:57 pm

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