
एनआईटी रायपुर के इस स्टूडेंट का इनोवेशन, जिसे देख विदेशी भी बोले वाह
ताबीर हुसैन @ रायपुर.इंजीनियर की काबिलियत का लोहा हर कोई मानता है। दरअसल, इसके पीछे लॉजिक यह है कि इंजीनियर प्रॉब्लम नहीं बल्कि सॉल्युशन पर सोचता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है एनआईटी रायपुर के छात्र आशीष शर्मा ने। जब भी हम किसी मरीज से मिलने जाते हैं तो ग्लूकोज बोतल पर नजर एक नहीं बल्कि कई बार जाती है। मरीज के साथ जो अटेंडर है वो तो उसकी बराबर मॉनिटरिंग करता है साथ ही नर्स देखती है। बोतल चढऩे से एक हिडन टेंशन यह रहती है कि इसे बदलना है या खत्म होने पर बंद करना है। अब तक ये मैनुअल ही होते आया है लेकिन एनआईटी के छात्र आशीष शर्मा ने एक प्रोटोटाइप डिवाइस ड्रिप मॉनिटरिंग सिस्टम ईजाद की है जिससे मोबाइल पर ग्लूकोज होने की जानकारी मैसेज से नर्स को मिलेगी साथ ही जब बोतल खाली होने पर आएगी तो कॉल भी चला जाएगा। इसे अस्पताल में टेस्ट किया जा चुका है। इतना ही नहीं इंटरनेशनल मीट इन्नोहैल्थ में भी आशीष ने इस इनोवेशन को प्रजेंट किया। इस मीट में आस्ट्रेलिया, इजराइल, फिनलैंड, इंगलैंड और अमरीका के एक्सपर्ट भी शामिल हुए। इस वार्षिक सम्मेलन में 5 इनोवेशन को सलेक्ट किया गया जिसमें से एक ड्रिप मॉनिटरिंग सिस्टम था। पेटेंट की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। आशीष ने इस इनोवेशन का क्रेडिट पैरेंट्स अजय-लक्ष्मी शर्मा, अंकल विकास शर्मा और डॉ सौरभ गुप्ता इंचार्ज ऑफ इनोवेशन सेल एनआईटी को दिया है।
सर्वे ने सोचने पर किया मजबूर
आशीष बायोमेडिकल थर्ड ईयर के छात्र हैं। वे बताते हैं कि पिछले साल एक मैग्जीन में सर्वे पढ़ा जिसके मुताबिक देश के सरकारी अस्पतालों में 1200 मरीजों पर एक डॉक्टर और 482 मरीजों पर एक नर्स हैं। तबसे मैंने मेडिकल फील्ड में आने वाली प्रॉब्लम पर सोचना शुरू किया। आइडिया आया कि ग्लूकोज की बोतल की मॉनिटरिंग पर भी डिवाइस बनाया जाए। शुरुआत में तीन बार फेलियर भी हुआ क्योंकि इसमें मेन प्वाइंट को पकडऩा जरूरी था। ऐसे करेगा कामपूरा कॉन्सेप्ट वजन का है। यह डिवाइस वजन के 10 हजारवें हिस्से को भी डिटेक्ट कर लेगा। बोतल लगते ही पहला मैसेज एक्शन का जाएगा। इसके बाद जब 50 प्रतिशत खाली होने पर और लास्ट 10 परसेंट होने पर। आखिर के 10 फीसदी ग्लूकोज होने पर नर्स के मोबाइल या जो भी नंबर फीड किया गया है उस पर फोन भी जाएगा। अगर ग्लूकोज चढ़ते वक्त किसी तरह की कोई रुकावट हो तो 5 से 10 सेकंड में ही इमरजेंसी कॉल चली जाएगी।
फ्लो रेगुलेटर करते हैं
डॉ अब्बास नकवी ने बताया कि मरीज की रिक्वायरमेंट के हिसाब से ग्लूकोज का फ्लो रेगुलेट किया जाता है। बोतल के साथ ड्रिप सेट से कनेक्ट करने पर एक घंटे में 100 एमल या 50 एमएल के हिसाब से स्पीड तय होती है। अभी तक अलॉर्म या कोई नोटिफिकेशन जैसी चीज नहीं बनाई गई थी। जिस छात्र ने इनोवेशन किया है वह मेडिकल फील्ड के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
Published on:
24 Oct 2019 12:33 am
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