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पितृदोष से रुक सकता है आपका वंश और हो सकते हैं निःसंतान, ऐसे करें पूरी विधि से निवारण

देश काल च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्।पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम्।। इस श्लोक का अर्थ है देश काल और पात्र में श्रद्धा द्वारा जो भोजन पितरों के उद्देश्य से ब्राह्मण को दिया जाता है, श्राद्ध कहलाता है।

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Pitra Paksha dosh Dur karne Ke Upay

Pitra Paksha dosh Dur karne Ke Upay

यदि कुंडली का नौंवां घर खराब ग्रहों से ग्रसित हो तो यह पूर्वजों की अधूरी इच्‍छाओं का संकेत है। इसे ही पितृदोष कहा जाता है। किसी सत्‍पुरूष, बाह्मण या कुलगुरु का अनादर किया गया है तो आप पितृ दोष से पीडित होते हैं। गोहत्‍या और पितरों को जल अर्पित न करना भी इस दोष का मुख्‍य कारण है।

349 दिन उनके लिए रात्रि का अँधेरा रहता है। ये 16 दिन पितृपक्ष के दिन कहलाते हैं। इन महत्वपूर्ण दिनों में मृतात्माओं के नाम पर श्रद्धा पूर्वक दिया गया अन्न-जल, वस्त्र ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह सूक्ष्म रूप से उन्हें प्राप्त हो जाता है और पितृ लोग संतुष्ट होकर पूरे वर्ष आशीष की वर्षा करते रहते हैं।

पितरों की श्रेणियाँ
हिन्दू-पंचांग में पितरों के श्राद्धकर्म के लिए विशेष समय निर्धारित किया गया है जिसे 'पितृपक्ष' कहते हैं। यह पक्ष आश्विन मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक रहता है जिसमें व्यक्ति अपने दादा, परदादा, मृत पिता या माता का श्राद्ध करता है।

शास्त्र में पितरों की भी कई श्रेणियाँ बतलायीं गयी हैं। जिस तिथि में व्यक्ति की मृत्यु होती है,उस तिथि के दिन मृत व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर पितृलोक से उस दिन लौट आता है, जहाँ पर उसकी मृत्यु हुई थी। अगर उसका उस तिथि पर श्राद्ध नहीं होता है, तो वह भूखा-प्यासा दुखी होकर लौट जाता है और जीवित पुत्र-पौत्रों को श्राप देता है। इससे उस घर पर पितृदोष लग जाता है। घर की सुख-शान्ति चली जाती है। इनके श्राप से कुल का वंश आगे नहीं बढ़ पाता है अर्थात् वह व्यक्ति पुत्रहीन हो जाता है और मरने पर उसे भी अन्न-जल की प्राप्ति नहीं होती है।

पितृ दोष के प्रभाव
पितृ दोष से पीडित लोग बड़े-बुजुर्गों का अपमान करते हैं और दूसरों की भावनाओं की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते। इन्‍हें पैसों की कमी रहती है। परिवार में लड़ाई-झगड़ा और क्‍लेश का माहौल रहता है। विवाह में देरी, संतान प्राप्‍ति में बाधा और पैसों में बरकत न होने जैसी समस्‍याएं झेलनी पड़ती हैं।

पितृ दोष शांति पूजा
पितृ दोष के निवारण हेतु पूजन की अनेक विधि हैं। सबसे उत्तम विधि वैदिक मंत्रों द्वारा किया जाने वाला विधान है। पितृ दोष की शांति के लिए इससे संबंधित ग्रहों को उनके मंत्रों द्वारा शांत किया जाता है।

पूजन का महत्‍व
यह पूजा अथवा अनुष्‍ठान कराने से आपके महत्‍वपूर्ण कार्य संपन्‍न होते हैं। इस पूजा के प्रभाव से आपके जितने भी रुके हुए काम हैं वो पूरे हो जाते हैं। शारीरिक और मानसिक चिंताएं दूर होती हैं। नौकरी, करियर और जीवन में आ रही सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती है।

भाई, भाई का पुत्र, पिता, माता, बहू, बहन सपिण्ड सोदक इनमें पूर्व के न होने से पिछले-पिछले पिण्ड के दाता कहे गये है।

इसके अलावा कुछ अन्य असरदार और उपयोगी उपाय

अमावस्या के दिन स्टील के लोटे में कच्चा दूध , दो लौंग , दो बतासे , डाब , काले तिल लेकर संध्या के समय पीपल के पेड़ पर चढ़ा दे फिर एक जनेऊ चढ़ाये | इससे पितृ देव खुश होते है |
* अमावस्या के दिन किसी बबूल के पेड़ के निचे संध्या को पितरो को समर्पित करते हुए भोजन रखे |
* प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है ।
* पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाकर महामृत्यूंजय का जाप करना चाहिए ।

* माँ काली की नियमित उपासना से भी पितृ दोष में लाभ मिलता है।
* खाना बनने के बाद पितरो के नाम से भी भोजन निकाले और गौ माँ को खिलाये |
* हो सके तो हर दिन रविवार को छोड़कर हर संध्या पीपल के पेड़ के निचे एक दीपक सरसों के तेल का पितरो के नाम पर जला कर आये और उन्हें आशीष मांगे |
* सर्व पितृ अमावस्या पर इनकी विदाई पूर्ण सम्मान और आदर के साथ दीपक जलाकर करे