यूथ फेस्टिवल : जिसकी लेना चाहते थे जान, उसी ने दिलाई पहचान
घर में जब तीसरी बार भी बेटी ही पैदा हुई, तो दादी ने उसे जान से मार डालने का फरमान सुना दिया था, लेकिन आज उसी बेटी की वजह से परिवार की अलग पहचान बनी है।
घर में जब तीसरी बार भी बेटी ही पैदा हुई, तो दादी ने नवजात शिशु को जान से मार डालने का फरमान सुना दिया था, लेकिन मां ने एेसा करने मना कर दिया। आज वक्त एेसा है कि उसी बेटी की वजह से परिवार की अलग पहचान बनी है।
यह कहानी है राजस्थान के कोटा में जन्मी निधि प्रजापति की। निधि को 20वें राष्ट्रीय युवा उत्सव में नेशनल यूथ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इससे पहले भी निधि ने अपनी उपलब्धियों से परिवार को कई बार गौरवान्वित किया है।
निधि उस समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण हैं, जो बेटियों को बोझ समझती हैं। इस बेटी ने अपने रास्ते खुद चुने और सफलता से आगे भी बढ़ रही हैं। अब पूरी तरह सोशल वर्क में जुट गई है।
घर-गृहस्थी बसाने के बजाय समाज सेवा को ही अपनी जीवन समर्पण करने का निर्णय ले चुकी हैं। निधि के आदर्श 'भारत के संतान' यूथ आर्गेनाइजेशन के फाउंडर एसएन सुब्बाराव है। वे उन्हीं के नक्शे-कदम पर चल निकली हैं।
वेतन की रकम जरूरतमंदों के नाम
निधि ने तीन विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन की उपाधि हासिल करने के बाद 'स्ट्रेस मैनेजमेंट ऑफ कोचिंग स्टूडेंट' पर पीएचडी कर रही हैं। साथ ही वे आत्मनिर्भर रहे इसके लिए वे सर्वोदय टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज कोटा में बीएड स्टूडेंट को पढ़ा रही है। इससे मिलने वाली 18 हजार मासिक वेतन में से 8 हजार रुपए गरीब छात्रों पर खर्च कर देती है।
2003 से सोशल वर्क में जुड़ी
निधि के मुताबिक वर्ष 2003 में उनकी मुलाकात समाजसेवी डॉ. एसएन सुब्बाराव से हुई। तब डॉ. सुब्बाराव 74 वर्ष के थे, लेकिन उनमें एनर्जी लेबल 20 साल के युवा जैसा था।
डॉ. सुब्बाराव के संपर्क आने के बाद निधि सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गईं। इस दौरान पहले तो घर-परिवार वाले काफी रोक-टोक करते थे। लेकिन निधि के समर्पण को देख परिजनों ने भी अपना समर्थन दिया।