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रंग-रंग के फूल खिले हैं, राजनीति के आंगन में

आम बात हो गई है महज विरोध के लिए विरोध करना और बेसिर-पैर का आरोप मढऩा

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रंग-रंग के फूल खिले हैं, राजनीति के आंगन में

फिल्म शोर का एक गाना है, 'पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो उस जैसा।Ó भारत के राजनीति परिदृश्य में ये गाना वर्तमान राजनीतिज्ञों के व्यवहार को देखकर सटीक बैठता है। देश में हरेक राजनीतिक दल में दूसरे दल से आए नेता मिल जाएगा। जो नेता जिस दल में गया, उसी दल के रंग-ढंग, आचार-विचार, बोल-चाल में रंग जाता है। वर्षों पूर्व से चली आ रही यह राजनीतिक परंपरा आज भी परस्पर कायम है।
राजनीति को 'काजल की कोठरी या कुआंÓ भी कहा जाता है। क्योंकि, इसमें जो कोई भी उतरा, समझो उस पर 'दागÓ लगना सौ फीसदी अनिवार्य है। राजनीति में रह कर 'आरोप रूपी दागÓ से आज तक कोई नहीं बच सका है। महज विरोध के लिए विरोध करना, विरोधी को बदनाम करने के लिए अनाप-शनाप, बेसिर-पैर का आरोप मढ़ देना तो आज की राजनीति में बेहद सहज व आम बात हो गई है।
'गई भैंस पानी मेंÓ, मुहावरा भी आज के स्वार्थी, अनीति और बदबदलू राजनीति में सटीक बैठती है। इस मुहावरा का प्रयोग तक किया जाता है जब अगर किसी का कोई काम बनने वाला ही हो और तभी कोई परेशानी आ जाए, उम्मीदों पर पानी फिर जाए। देश में कितने ही नेता हैं, जो दल-बदल के बाद 'न घर के रहे, न घाट के।Ó उनकी उम्मीद पर फिर गया। ऐसे नेताओं की भी सूची लम्बी है, जिनकी राजनीतिक मुरादें नई पार्टी में पूरी नहीं होने पर 'लौट के बुद्धू घर को आएÓ, कहावत को साक्षात चरितार्थ किए हुए हैं। हद तो यह है कि उन्हें ऐसा करने में जरा सा भी न शर्म आती है और न ही झिझक होती है। अलबत्ता वे इस 'राजनीति क्रियाÓ को हंसते-मुस्कुराते 'घर वापसीÓ का नाम देकर तमाम तरह के तर्क-वितर्क पर विराम-सा लगा देते हैं।
राजनीति के कई 'रंगÓ हैं तो उसमें कई प्रकार के 'भंगÓ भी पड़ते रहते हैं। आजकल 'भंगÓ डालने वाले का किरदार निभाने का जिम्मा शायद 'सोशल मीडियाÓ ने ले रखा है। कोई बात नेताओं के मुंह से निकली कि, 'कमान से छूटे तीर और बंदूक से निकली गोलीÓ सी तेजी से 'सोशल मीडियाÓ पर पहुंच जाता है। फिर 'दे दना दनÓ प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया शुरू। कई लोग तो ऐसे भी होते हैं, जो बगैर सोचे-समझे, गुणे-विचारे 'राम-राम, राम-रामÓ को 'मरा-मरा, मरा-मराÓ समझकर अपनी प्रतिक्रिया पोस्ट कर देते हैं। फिर सामने वाले सफाई देते रहे या खुद। तब तक देर हो चुकी होती है। 'चिडिय़ा दाना चुग कर फर्र हो जाती है।Ó यानी किसी का कुछ बिगडऩा होता है वह बिगड़ चुका होता है। जिसकी भरपाई लाख सफाई देने का बाद भी नहीं हो पाता।
यह अजब-गजब सत्य है कि आंखें सो जाती हैं, परंतु मनुष्य जागता है। क्योंकि, अवचेतन कमी सोता नहीं। सबसे दुख इस बात का है कि जागे हुए को जगाए कौन। यही हाल देश की जनता का है। वह सब जानती है कि सरकार के नुमाइंदे उनके हितकारी नहीं हैं। लेकिन जनता का बस यही रोना है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। चुनें किसे? कोई नागनाथ है तो कोई सांपनाथ। राजनीतिक में हमेशा से अच्छे (निस्वार्थी) और बुरे (स्वार्थी) दोनों तरह के लोग रहे हैं, और शायद आगे रहेंगे भी। सच यह भी है कि हालात सदा एक सा नहीं रहता। लेकिन इसके लिए जनता को ही प्रयास करना होगा।


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