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इन 28 गांवों के लोग आज भी जी रहे गुलामी की ऐसी जिंदगी, यहीं सजती है डोली और उठती है अर्थी

यह पूरा मामला रायगढ़ जिले का है।
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रायपुर

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Chandu Nirmalkar

•

Updated: 18 Jul 2018, 3:43 PM IST

CG News

इन 28 गांवों के लोग आज भी जी रहे गुलामी की ऐसी जिंदगी, यहीं सजती है डोली और उठती है अर्थी

जयंत कुमार सिंह@रायगढ़. जब बेटी या बेटे का विवाह करना हो, किसी को गंभीर बीमारी होने पर उपचार कराना हो, किसी के घर नन्हा मेहमान आने वाला हो या फिर किसी की मौत हो जाने पर उसका अंतिम संस्कार करना हो तो पैसों के इंतजाम के लिए अपनी जमीन गिरवी रखना पड़ता है। सरकार के नियम के मुताबिक जमीन को बेच नहीं सकते इस वजह से ऐसा करना उनकी मजबूरी हो जाती है। यह पूरा मामला रायगढ़ जिले का है।

जी रहे गुलामी की जिंदगी
दरअसल सरकार ने यहां की जमीन की खरीद-बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यह पीड़ा एक, दो या तीन गांवों के लोगों की नहीं, बल्कि गोमरडा अभ्यारण्य से सटे 28 गांवों की है। डोंगीपानी गांव के सहनी सिदार और खहारपाली के गणेश ने बताया कि प्रतिबंध की वजह से लोग अपनी जमीन बेच नहीं पा रहे हैं। उन्हें विवश होकर गिरवी रखना पड़ता है और जब तक वो रेहन के पैसे चुका नहीं देते हैं तब तक उनकी जमीन पर रेहन देने वाला ब्याज के रूप में फसल बोता है और ले जाता है। वहीं, जिसने अपनी जमीन को रेहन रखी है वो मालिक से मजदूर बन जाता है। कुछ ग्रामीण तो अपने ही खेत में मजदूर बनकर काम करते हैं। कुछ गांव छोड़कर बाहर कमाने चले गए हैं।

सरकार बोली- नहीं हटेगा प्रतिबंध

इस मामले में लगातार 18 साल से परेशान प्रभावितों ने अब आवाज उठानी शुरू कर दी है। अधिकारियों से लेकर नेताओं तक प्रतिबंध हटाने की मांग की जा रही है। इसी कड़ी में वर्ष-2015 में पीएमओ को भी पत्र भेजा गया था। जहां से यह जवाब आया कि कलक्टर ने ऐसा कोई भी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, बल्कि ये सभी ग्राम गोमरडा अभ्यारण्य के भीतर आते हैं इसलिए उत्तराधिकार हक को छोड़कर अन्य रीति से अधिकार पर रोक है। हमारे द्वारा केवल प्रावधानों का पालन किया जा रहा है, इसलिए यह प्रतिबंध हटना संभव नहीं है।

मांगे नहीं हो रही पूरी
ग्रामीणों की ओर से पुनर्वास की मांग तो की जा रही है पर विभाग जो शर्त रख रहा है वो ग्रामीणों को मंजूर नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग प्रति 18 वर्षीय पुरुष पर पांच एकड़ व पचास हजार रुपए देना चाहता है। पर जहां पर वो जमीन देने की बात करते हैं वो जमीन बंजर है, वहां पौधे तक नहीं बढ़ पा रहे हैं फिर हम अपनी खेती, मकान, गांव छोड़कर उस बंजर जमीन पर अपनी दुनियां फिर से कैसे बसाएं। किसानों की ओर से प्रति एकड़ 15 लाख व घर, मकान, पेड़ आदि के मुआवजे की मांग की जा रही है।

कोई नहीं देना चाहता है अपनी बेटी
पीडि़तों के अनुसार, गांवों में रेहन के दम पर बेटी की डोली तो उठ जाती है पर बेटे का सेहरा बड़ी मुश्किल से बंध पाता है। दूसरे गांव के लोग अपनी बेटी इन गांवों में ये सोचकर नहीं देते हैं कि जमीन तो है पर वो उसके मालिक नहीं है। वो उसे बेच ही नहीं सकते, ऐसे में यदि कोई इमरजेंसी की स्थिति हुई तो सिवाए हाथ फैलाने के उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। बड़ी मुश्किल से बेटे का विवाह हो पाता है।

यह है मामला
ये पूरा मामला 15 फरवरी 2000 से मुख्य सचिव के पत्र से आरंभ हुआ है। कलक्टर को लिखे गए इस पत्र में सीएस ने कहा कि वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 20 एवं 32 का उल्लंघन करने का मामला सामने आ रहा है। इसके तहत अभयारण्य क्षेत्र में जमीन की खरीदी-बिक्री पर रोक लगाई जाए। इसके बाद से इन 28 गांवों में जमीन की खरीद बिक्री पर रोक लग गई। इसमें गंधराचुआं, रामटेक, सराईपाली, घठोरा, अचानकपाली, नरेश नगर, टमटोरा, बेहराबहाल, शिवपुरी, पठारीपाली, पीपरदा, दबगांव, गोमर्डा, भाटाकोना, जवाहरनगर, लुरका, बगबंध, नवापाली, देवसर, छिंचपानी, कनकबीरा, दमदरहा, नरंगीखोल, माजरमाटी, खम्हारपाली, भालूपानी, कोर्रापानी व डोंगीपानी शामिल है।

काफी मुश्किल हो रही है, कई आर्थिक और सामाजिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अब हम एकजुट हो रहे हैं और इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं।
गणेश राम पटेल, सरपंच, खम्हारपाली

आवेदन लंबित
परेशानी तो है। संबंधित ग्रामीणों को पुनर्वास के लिए कई जगह भी दिखाए गए हैं पर उन्हें ये पसंद नहीं आ रहा है। रोक के बाद ग्रामीणों की क्या स्थिति है, कभी इसकी पतासाजी नहीं की गई है।
आरके जायसवाल, प्रभारी रेंजर, गोमर्डा