
तोला माटी कोड़े ल नइ आवय मीर
बर बिहाव हमर लोक संस्करीति के अंग आय। जउन ह हमन ल विरासत म मिले हे। बर बिहाव वंस बढ़ोतरी के संगे-संग परेम, परस्पर सहयोग अउ सहज आकरसन के किताब आय। किताब के पन्ना ल जेठउनी (तुलसी बिहाव) ले पढ़े ल धर लेथे। राम नउमी पाख अउ अकती म जादा भांवर परथे। अकती ल देव लगन माने गे हे।
बहू खोजई : सबले पहिली घर के सियान ह अपन घर के बहू बने के लइक लडक़ी टटोलथे। जान पहिचान रिस्ता नातामन सगा जोड़े म सहयोग करथे। पहिली तो मुखिया ह लडक़ी देख लेथे। वोकर बाद बेटा ल लडक़ी देखे बर भेजथे। मान ले लडक़ा ह लडक़ी ल पसंद कर डरिस ताहन फेर गोठ-बात ल आगू बढ़ाथे। आगू जमाना म तो जउन ल सियान ह पसंद कर लिस बहु बनाए बर उही ल बेटा के टोटा म घंटी बांध देवत रिहिन हे। मान ले बात पक्का होय के बाद अउ सगा उतरथे उन ल लडक़ी के बाप ह हाथ जोड़ के कहि देथे मंय तो फलाना जघा बेटी ल हार डरें हंव सगा। मान ले लडक़ी पक्छ वालेमन ल लडक़ा पसंद नइ आवय या बर बिहाव करे के ताकत नइ राहय या अउ कोनो कारन से बिहाव नइ कर सकय तब सगा ल कहि देथे ऐसो तो मोर हिम्मत नइहे सगा बिहाव करे के।
मान ले लडक़ी सुग्घर हे, गोरी हे अउ वोकर होवइया पति बिलवा हे। ये बात ल जान के नोनी के जी ह उदास हो जथे। बिहाव करे बर वोकरमन थोरको नइ तियार होवे। अइसन म नारी-परानीमन समझाथे। तोर सही भागमानी कोनो नइहे नोनी, भगवान कस जोड़ी फबे हे तुंहला। राम, बिसनु, संकर अउ किरिस्न ह तो सांवला रिहिस हे। फेर सीता, लछमी, पारबती अउ राधा ह तो गोरी रिहिस हे। तोर ले किस्मत वाले कोनो नइहे जेन ल भगवान कस सांवला पति मिले हे। रही बात रंग के त फेर सुन, महतारी के कोख ह कुम्हार के आवा ताय कोनो करिया हो जथे त कोनो पडऱी। करिया गोरिया बिटियाझन कांही कहिबे
करिया हे सिरी भगवान हो
माई के कोख कुम्हार के आवा
कोई कारे, कोई गोरे हो।
फलदान : फल दान के दिन लुगरा-पोलखा, चूरी-चाकी, तेल-फूल अउ हरदी, सुपारी धर के लडक़ा पक्छ वालेमन लडक़ी के घर जाथे। बर पक्छ डहर ले लाने सामान ल चउंक के तीर म मड़ा देथे। गौरी पूजा होथे। हवन होथे। दूनो पक्त हवन करथे। हवन के बाद दूनों समधी एक- दूसर के कान म दूबी खोंच के समधी भेंट कर के जै जोहार बनाथे। बर पक्छ डहर ले लाए सिंगार के जिनिस ल सुबासिन ह लडक़ी करा लेगथे। इही लुगरा-पोलखा ल पहिरा के लडक़ी ल पांव पराए बर निकालथे। पांव परौनी सगुन के रुपिया धराथे। फलदान के खुसी म बर पक्छ वालेमन पररा बिसाथे। फलदान ल आधा बिहाव मान लेथे।
चुरमाटी : चुरमाटी के दिन नेवतहार सगामन बिहतरा घर पहुंच जाय रहिथे। चुरमाटी झोंके बर ममा-मामीमन लुगरा लानथे। इही लुगरा म चुरमाटी झोंके जाथे। फूफू ह तेल चघनी कपड़ा लानथे। इही कपड़ा (सादा) ल पहिरा के तेल हरदी चघाथे। पिसान के घोल, भात के मुठिया अउ गोबर धर के चुरमाटी बर सगा सोदरमन बाजा-गाजा के संग जाथे। साबर म धोती ल खोंच के खांध म बोहे रहिथे। वोला ढेड़हा कहिथन। ढेड़हा ह माटी खानथे। ये समे भड़ौनी गीत गाए जाथे।
तोला साबर धरे ल नइ आवय मीर
धीरे-धीरे तोर पागा ल तीर।
तोला माटी कोड़े ल नइ आवय मीर
धीरे-धीरे अपन कनिहा ल तीर।
तोला माटी जोरे ल नइ आवय मीर।
मायन : मायन के दिन डूमर के डारा, आमा के पाना के मड़वा छाथे। एक बिहाव म दू मड़वा। गड्ढा करके तांबा, रुपिया डार के एक जोड़ी बांस ल एक-एक जघा गडिय़ाए जाथे। घर के मुंहाटी के दूनों ओर मड़वा गडिय़ाथे जेकर ऊपर कांसी बंधाए रहिथे। मड़वा म सील ल ओधा देथे। इही सील म हरदी ल पीस के हरदी चढ़ाए के सुरुआत हो जथे। ढेड़हीन के अंगरी ल बर-बधु धर के मड़वा के चारो मुड़ा किंजरथे। वोकर पीछू-पीछू पररा म हरदी धर के बेटी- माईमन किंजरथें। बिहाव के निपटत ले बर-बधु ल सुता पहिराए के परम्परा ह पहिलीच ले चले आवत हे।
Published on:
21 Nov 2022 04:22 pm
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