
सत्यजीत रे जन्मदिन विशेष : छत्तीसगढ़ के कलाकारों के मुरीद थे रे,अपने टेलीफिल्म में दिया था मौका
रायपुर. हर दिन की तरह 2 मई भी ख़ुशी और गम दोनों वजहों के लिए जाना जाता है। जहाँ आज के दिन भारत में सत्यजीत रे जैसे महान शख्सियत का जन्म हुआ तो वहीं दूसरी तरफ प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी और महान चित्रकार लिआनार्दो द विंची आज ही के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए थे।
2 मई 1921 को कलकत्ता में जन्मे सत्यजीत रे ने शुरुआत में विज्ञापन ऐजेंसी में बतौर जूनियर विज्युलाइजर काम शुरु किया था। इसी दौरान उन्होंने कुछ बेहतरीन किताबों के आवरण बनाए जिनमें से मुख्य थी जिम कार्बेट की 'मैन इटर्स ऑफ कुमायू' और जवाहरलाल नेहरु की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया'।इसके अलावा उन्होंने 1928 में छपे विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के मशहूर उपन्यास पाथेर पांचाली का बाल संस्करण तैयार करने में सत्यजीत रे ने अहम भूमिका निभाई थी।
तब कौन जानता था कि किताबों के आवरण बनाने वाला लड़का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाला पहला भारतीय फिल्मकार बन जाएगा। रे न केवल एक बेहतरीन लेखक बल्कि अलहदा दृष्टिकोण के फिल्मकार थे। उनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली ने अनेक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते जिसमें कान फिल्म फेस्टिवल का 'श्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज' का सम्मान भी शामिल है।
1949 में सत्यजीत रे की मुलाकात फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से हुई जो उन दिनों अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए लोकेशन की तलाश में कलकत्ता आए थे। रे ने लोकेशन तलाशने में रेनोआ की मदद की और इसी दौरान रेनोआ को लगा कि रे में बढ़िया फिल्मकार बनने की भी प्रतिभा है। उन्होंने यह बात रे से कही भी। यहीं से रे के मन में फिल्म निर्माण का विचार उमड़ना शुरू हुआ।
सत्यजीत रे को गए कई दशक बीत गए लेकिन भारतीय सिनेमा पर उनकी छाप खत्म नहीं हुई है। श्याम बेनेगल से लेकर अपर्णा सेन, विशाल भारद्वाज, दिबाकर बनर्जी और सुजॉय घोष जैसे तमाम नामचीन निर्देशकों और भारतीय सिनेमा पर उनका असर देखा जा सकता है।
भारतीय सिनेमा में उन्होंने नए आयाम स्थापित किये। उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना है। भारतीय सिनेमा के वो एकमात्र ऐसे कलाकार हैं जिन्हे पद्मश्री से पद्म विभूषण तक और ऑस्कर अवॉर्ड से लेकर दादासाहेब फाल्के पुरस्कार तक से नवाजा गया है। इसके अलावा 32 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से भी उन्हें नवाजा जा चुका है।
सत्यजीत रे और छत्तीसगढ़
आज भले छत्तीसगढ़ी कलाकार संघर्ष कर रहे हों लेकिन एक वक्त था जब यहाँ की कला और कलाकारों का सम्मान सत्यजीत रे जैसे दिग्ग्गज भी करते थे। वह यहाँ के लोक कला के मुरीद भी रहे हैं। सत्यजीत रे के साथ काम करने के लिए देश और दुनिया के दिग्गज कलाकार तरसते हैं वहीं छत्तीसगढ़ के ऐसे कलाकार हैं जिन्हे उनके साथ काम करने का सौभग्य प्राप्त है।
भैयालाल हेड़ाऊ-एक बेहतरीन अभिनेता होने के साथ-साथ गायक एवं उद्घोषक भी है। सन् 1981 में हेड़ाऊजी सत्यजीत रे के टेलीफिल्म सद्गति में अभिनय की। भैयालाल हेड़ाऊ के पिता वासुदेव हेड़ाऊ एक बहुत अच्छे कलाकार थे।
घर के वातावरण मेे ही कलाकारी थी। बचपन से वे गीत गाते रहे। भैयालाल हेड़ाऊ 1971 में चंदैनी गोंदा के साथ जुड़े और बाद में सोनहा बिहान, नवाविहान, अनुराग धारा छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंडली में गाते रहे, अभिनय करते रहे। उन्हें बहुत बार सम्मानित किया गया है।
बरसाती भइया - उनका नाम है केसरी प्रसाद बाजपेयी। आकाशवाणी के छत्तीसगढ़ी उदधोषक बहुत ही कम है, ऐसा लोगों का मानना है। उन्होंने सन् 1950 में आकाशवाणी नागपुर में उदघोषक और आलेख लेखक के रुप में काम शुरु की।
छत्तीसगढ़ी कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने का एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लोक कलाकारों को आगे लाने का श्रेय बरसाती भइया को जाता है। सन् 1964 से आकाशवाणी रायपुर में छत्तीसगढ़ी प्रसारण के मुख्य दायित्व उन्होंने सम्भाला। बहुत अच्छे कलाकार है बरसाती भइया। उन्होंने सत्यजीत रे के निर्देशित सद्गति में भी अभिनय किया है।
इनके अलावा छत्तीसगढ़ के अन्य कलाकारों में शेफाली शुक्ला, ऋचा मिश्रा, सलिल धर दीवान, श्यामसुन्दर शर्मा, वाहिद शरीफ, आनंद चौबे, आनंद वर्मा, रत्ना भट्ट, , नरेन्द्र ठक्कर आदि ने सत्यजीत रे के साथ काम किया। ये सभी रंगमंच के कलाकार हैं। फिल्म की शूटिंग महासमुंद केसवा, पलारी और छतौना में हुई थी।
सत्यजीत रे जैसे दिग्गज सदियों में एक बार आते हैं लेकिन उनका योगदान उनके होने या नहीं होने से परे हैं या यूँ कहें की इसे ही अमरत्व कहते हैं।
का राखे है तन मा संगी
का राखे है तन मा
तोर नाम अमर कर ले गा भइया
का राखे है तन मा.......
-गीतकार संतोष शुक्ला
Published on:
02 May 2019 01:44 pm
बड़ी खबरें
View Allरायपुर
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
