
बनारस के अलावा यहां भी है बाबा विश्वनाथ का मंदिर, सावन में दर्शन मात्र से पूरी होती है मनोकामना
रायपुर. विश्वविख्यात बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी विश्वनाथ के बारे में कौन नहीं जानता। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग यहां विराजमान है। एेसा ही काशी विश्वनाथ मंदिर छत्तीसगढ़ में भी है जो लोगों की गहरी आस्था से जुड़ी हुई है। राजधानी रायपुर से 19 किमी दूर आरंग के नवागांव में बसे काशी नगरी में हर साल सावन के महीने में बाबा का विशेष श्रृंगार होता है। यहां आने पर आपको एेसा लगेगा मानो काशी के पावन भूमि बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने आए हो।
बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से दूर हो जाते हैं सभी दुख
सावन मास शुरू होने के साथ ही अनेक स्थानों से श्रद्धालु भगवान का अभिषेक कर सुख-समृद्धि की कामना करने पहुंचते हैं। जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक के कर अपनी मुरादें पूरी करते हैं। मान्यता है कि भगवान विश्वनाथ के दर्शन मात्र से सभी तरह के दुख दूर हो जाते हैं। पुरातात्विक महत्व के अनुसार भगवान विश्वनाथ का यह मंदिर राजा-महाराजाओं के जमाने में ईटों से बना हुआ है।
कमरे में आज दिन-रात जलती है ज्योति
उसी स्थान पर अवशेष मिला था, जहां पर भगवान शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के सर्वराकार बालमुकुंद अग्रावाल बताते हैं कि आरंग के सीता बगीचा में 400 वर्ष पुराने इस मंदिर के अवशेष प्राचीनता के गवाह हैं। कभी यह स्थान साधु-संत मंदिर में आकर तंत्र-मंत्र की सिद्धि करते थे। यह स्थान सिद्धी प्राप्त करने का केन्द्र बिंदु था । यहां मंदिर में 345 वर्ष पहले तीन साधुओं ने समाधि लिया था। गर्भगृह के पास एक गुफानुमा कमरे में आज भी वहां दिन-रात ज्योति जलती है । एक समाधि बगीचे में और दूसरी समाधि तालाब के किनारे है।
50 खंभे, 6 चक्र बढ़ाते हैं शोभा
अग्रवाल बताते हैं कि 50 खंबे 6 चक्र शोभायमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव, पार्वती के साथ रूद्र के अवतार भैरव विराजमान हंै। शिवलिंग के ऊपर गणेश जी की मनोहारी प्रतिमा का दर्शन मंदिर में प्रवेश करते होता है।
भैरव बाबा का मंदिरा से अभिषेक
भैरव बाबा का प्रतिदिन मदिरा से भक्तों द्वारा अभिषेक किया जाता है। शिव जी की पूजा सुबह 5 बजे से आरंभ होती है, शाम को वैदिक विधान से अभिषेक किया जाता है। सावन मास और महाशिव रात्रि पर्व पर यहां भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है । वर्ष 2015 में 1008 शिवलिंग की स्थापना मंदिर के गर्भगृह के सामने की गई है। बालमुकुंद अग्रावाल विगत 16 सालों से निवास छोड़कर भगवान की सेवा में लगे हुए हैं।
भस्म में होता है आरती
भगवान विश्वनाथ के गर्भगृह के सामने यज्ञकुंड में कुए के अनुष्ठान के भस्म से विश्वनाथ के विशेष दिन पर साल में एक बार भस्म से अभिषेक और पूजा किया जाता ।
By दिनेश यदु
Published on:
13 Aug 2018 06:44 am
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