
पत्रिका प्लस से विशेष बातचीत करते गौहर रजा
ताबीर हुसैन @ रायपुर .गौहर रजा पेशे से एक वैज्ञानिक हैं। अग्रणी उर्दू कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और दस्तावेजी फिल्म निर्माता हैं। उन्होंने 2008 में शॉर्ट मुवी 'इंकलाब' का निर्देशन किया। इससे पहले वे सुभाष कपूर द्वारा निर्देशित 'से सलाम इंडिया ' में म्यूजिक भी दे चुके हैं। वैसे तो उनकी उपलब्ध्यिों की एक लंबी फेहरिस्त है, हाल ही में वे एक मुशायरे में शिरकत करने रायपुर आए। पेश है उनसे बातचीत के अंश:
उर्दू का मुकाम सिर्फ मुशायरों तक सिमट कर रह गया है?
ये बात सही है कि उर्दू का चेहरा उसके शायर बचे हैं। इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि उर्दू को ज्यादातर लोग खासतौर से वो जो उर्दू के दायरे से बाहर हैं। शायरों, गजल, नज्मों, गानों और कुछ अलफाज की वजह से जानते हैं। ये किसी भी जबान के लिए अच्छा नहीं है कि उसे सिर्फ शायरी की वजह से जाना जाए।
देश में अभिव्यक्ति को लेकर कोई दबाव मानते हैं आप?
बीते चार सालों में जिस तरह की कहानियां सामने आ रही है, उसे महसूस कर यह कहा जा सकता है कि यकीनन अभिव्यक्ति पर हमला है और जबरदस्त हमला है। हम अपने स्याही को सूखने न दें। उसका कत्ल न होने दें। हम उसकी इस तरह से हिफाजत करें जिस तरह से कोई अपनी संपति की हिफाजत करता है। जैसे कोई अपने देश की सुरक्षा करता है। या घर की देखभाल करता है।
अब तक आपकी क्या उपलब्धियां रहीं ?
सफर हमेशा सफर होता है। मेरा सफर भी आम सफर है। इसमें एेसा कुछ नहीं है कि जिसे मैं उपलब्धियों की शक्ल में दुनिया के सामने पेश कर सकूं। मैंने जो महसूस किया, जो औरों से लिया वही समाज को देने की कोशिश की। वो चाहे शायरी हो चाहे फिल्म हो या फिर साइंस हो। आने वाले दिनों में सफर जारी रहेगा। तब तक मेरी यही कोशिश रहेगी कि मैं समाज को कुछ दे सकूं। खासतौर पर फिल्म और शायरी के माध्यम से ये कोशिश की है कि उन चीजों को अपने सुनने वालों का ध्यान दिला सकूं जो समाज के अंदर गंदगी पैदा करती हैं। मेरी जिंदगी में कोई मोड़ एेसा नहीं आया जो यह बता सके कि मेरी उपलब्धि क्या है। सआदत हसन मंटो का कहना था कि कुछ लोगों को समाज में यह जिम्मेदारी लेनी होती है कि वे समाज की गंदगी को कुरेदे। ताकि उसकी बदबू फैले और लोग उन बुराइयों से नफरत करे। मैं समझता हूं कि कुछ लोगों की जिंदगी का ये मकसद होता है और होना भी चाहिए। मेरा भी यही उद्देश्य है। अगर मैं इसमें थोड़ा भी कामयाब हो जाऊं तो यही मेरी उपलब्धि होगी।
नई पीढ़ी से क्या उम्मीदें हैं? क्या मैसेज देंगे?
नई पीढ़ी से मुझे बेहद उम्मीदें हैं। मैं हमेशा यह कहा करता हूं कि नई नस्ल की ये जिम्मेदारी और हक दोनों ही है कि वे हमारी नस्ल से बेहतर हों। हमारी नस्ल की ये जिम्मेदारी है कि हम नई नस्लों को अपने से बेहतर बनाने की जुस्तजु में, कोशिश में लगातार लगे रहें। मुझे लगता है कि मुल्क में यूथ का बड़ा हिस्सा हमसे बेहतर है और वो हमारी तरह ही उस ख्वाब से पूरी तरह जुड़ा हुआ है जो इंसान की बराबरी का ख्वाब है। अमन, चैन, बेहतर विज्ञान, समाज में इंसान की मेहनत को उसकी उजरत दिलाने का ख्वाब है। ये ख्वाब अलग और नए और बेहतर तरीके से हमारे समाज का एक हिस्सा देख पाए। परेशानी ये है कि जिस मोड़ पर हम दुनिया को देख रहे हैं वहां रुढिवादी विचारधारा अपने बुझते हुए चिराग में बड़ी तेजी के साथ तेल डाल रही है। उसे भड़का रही है। ये जंग लगातार जारी रही है। और हमारी नई पीढ़ी इस जंग से लडऩे के लिए पूरी तरह से तैयार है।
Published on:
15 Apr 2018 11:23 am
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