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10 हजार महंगा हुआ सरिया, फैक्ट्रियों में 42 हजार का स्टील बाजार आते तक 52 हजार

स्टील पर भारी 18 फीसदी जीएसटी, एक टन में 7560 रुपए का टैक्स

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10 हजार महंगा हुआ सरिया, फैक्ट्रियों में 42 हजार का स्टील बाजार आते तक 52 हजार

10 हजार महंगा हुआ सरिया, फैक्ट्रियों में 42 हजार का स्टील बाजार आते तक 52 हजार

रायपुर. फैक्ट्री से निकलने वाले स्टील में टैक्स, ट्रांसपोर्टिंग भाड़ा, डीलर कमीशन और अन्य खर्चों के बाद 40 से 42 हजार में बनने वाला स्टील बाजार आते तक 50 से 53 हजार रुपए में मिल रहा है। बीते साल से सरिया 10 हजार रुपए प्रति टन महंगा हो चुका है। आयरन ओर की महंगाई ने स्टील की बढ़ती कीमतों में आग में घी डालने का काम किया। आयरन ओर की कीमतों में मार्च से लेकर दिसंबर महीने तक की स्थिति पर गौर करें तो 5 से 6 हजार रुपए की बढ़ोतरी आ चुकी है। उद्योगपतियों के मुताबिक इससे पहले उद्योगों से निकलने वाले फिनिश गुड्स यानि तैयार स्टील की कीमत 32 से 36 हजार के बीच रहती थी, लेकिन आयरन ओर की महंगाई और उत्पादन लागत का खामियाज आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
यह कीमत अब 40 से 42,500 हजार रुपए प्रति टन तक पहुंच चुकी है। इस कीमत में 18 फीसदी जीएसटी की वजह से 7200 से 7560 रुपए अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ती है। जीएसटी के साथ ही फैक्ट्री से बाजार तक माल आने में 300 से 500 ट्रांसपोर्टिंग भाड़ा प्रति टन साथ ही डीलर कमीशन में 1 से 2 रुपए प्रति किलो के हिसाब से लोहा आम ग्राहकों को 50 हजार के पार मिल रहा है।
एक साल में 10 हजार टन का उछाल

बीते वर्ष दिसंबर महीने की बात करें तो फैक्ट्रियों से सरिया 36 से 38 हजार रुपए प्रति टन में तैयार हुआ। इसमें 18 फीसदी जीएसटी, ट्रांसपोर्टिंग भाड़ा और डीलर कमीशन के साथ ही बाजार में स्टील 46 से 48 हजार रुपए में बिका था। कोविड-19 के बाद से सरिया में महंगाई शुरू हो गई। स्पंज आयरन इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष अनिल नचरानी का कहना है कि स्पंज आयरन की कीमत अप्रैल से हर महीने 400 से लेकर अधिकतम 1500 तक बढ़ी है, जिसकी वजह से उत्पादन लागत में वृद्धि हुई और सरिया महंगा हुआ।
अब फैक्ट्रियों में भी छोटी डील
लोहे की कीमतों में जबरदस्त उछाल के बाद अब राजधानी के आस-पास लगे फैक्ट्रियों में छोटी डील होने लगी है, यानि 2 टन की बिलिंग भी होने लगी है। यही कारण है कि कई ग्राहक बाजार के बजाय सीधे फैक्ट्रियों से माल ले रहे हैं। इसमें डीलर कमीशन के साथ ही ट्रांसपोर्टिंग भाड़े में राहत मिल रही है। हालांकि कांट्रेक्टर और बिल्डर्स पहले से ही फैक्ट्रियों से माल उठाते आ रहे हैं।