
कृषि विवि के ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद प्रतिभागी युवा।
ताबीर हुसैन @ रायपुर। आमतौर पर युवाओं में खेती-किसानी के प्रति रुझान नहीं रहता। या तो वे बिजनेस करना चाहते हैं या देश के प्रीमियर इंस्टीट्यूट में पढ़कर मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग या डॉक्टरी के पेशे में कॅरियर बनाना चाहते हैं। कुछ ऐसे भी युवा हैं जिन्होंने एग्रीकल्चर की पढ़ाई तो की लेकिन कॅरियर दूसरी फील्ड में बना लिया। आज हम आपको उन युवाओं से रूबरू करा रहे हैं जो खेती के क्षेत्र से नहीं है लेकिन मिट्टी ने उन्हें पुकारा और वे फॉर्मिंग की दुनिया में आ गए। सोमवार से इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय युवा सम्मेलन की शुरुआत हुई। यहां देश के 20 कृषि विवि के 500 से ज्यादा स्टूडेंट्स शामिल हो रहे हैं। 7 विवि के कुलपति, युवा वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसान भी आए हैं।
इंजीनियर रहते हुए मिलते थे 30 हजार, अब हर महीने दो लाख की अर्निंग
हैदराबाद करीमनगर के मल्लिकार्जुन रेड्डी आईटी सेक्टर में 4 साल से जॉब कर रहे थे। इस दौरान हर महीने उन्हें 30 हजार सैलरी मिल रही थी। रेड्डी ने बताया कि आईटी में जॉब के दौरान मैंने अखबार में पढ़ा कि युवाओं में एग्रीकल्चर के प्रति रुझान घट रहा है जबकि अगर वे तकनीक का इस्तेमाल करें तो लाखों की कमाई कर सकते हैं। मैंने इस पर रिसर्च शुरू किया। चूंकि हमारे यहां जमीन थी, मैंने जॉब स्वीच कर फॉर्मिंग की प्लानिंग की। आज की तारीख में मैं धान की 23 सेमी ऑर्गेनिक फसल ले रहा हूं। इसके अलावा सन फ्लॉवर, तिल, मूंगदाल और उरददाल की उपज ले रहा हूं। इतना ही नहीं बकरी, मछली और मुर्गी पालन भी कर रहा हूं।
साढ़े तीन साल बैंकिंग में दिए, अब किसानों के लिए कर रहे रिसर्च
तेलंगाना से आए साईंकांत डीआरके एग्रीकल्चर एक्सटेंशन में पीएचडी कर रहे हैं। वे आंध्रा बैंक में जॉब कर रहे थे जहां 5 लाख रुपए सालाना पैकेज था। जॉब से सटेसफेक्शन नहीं मिला तो दूसरी फील्ड के लिए सोचा। इंटरनेट वगैरह में देखा तो पता चला कि हमारी मिट्टी तो सोना उगलती है, लेकिन किसानों को टेक्नीक की समझ नहीं होने से पर्याप्त लाभ नहीं ले पाते। तब मैंने तय किया कि इसी फील्ड में रिसर्च करूं। अभी मैं किसानों के लाइवलीहुड पर अनुसंधान कर रहा हूं।
हर्षिता को मिले 3 गोल्ड
कवर्धा से आकर यहां पढ़ाई कर रही हर्षिता तिवारी को यूजी क्लासेस में हर साल गोल्ड मिला। कार्यक्रम में उन्हें तीन गोल्ड देकर सम्मानित किया गया। हर्षिका अभी पीजी में एग्रोनॉमी की पढ़ाई कर रही हैं। वे कहती हैं कि बेसिकली मैं बॉयो से हूं। कुछ डिफरेंट करना था इसलिए एग्रीकल्चर को चुना। यूजी के अंतर्गत इसमें रुरल एग्रीकल्चर एक्सटेंशन ऑफिसर और पीजी के बाद एसएडीईओ की जॉब अपॉर्चुनिटी रहती है। इसके अलावा आप एग्रीकल्चर टीचर भी बन सकते हैं।
संस्कृत में आचार्य की डिग्री लेकिन बन गए प्रगतिशील किसान
इलाहाबाद से आए चंद्रप्रकाश कुशवाहा शास्त्र में आचार्य हैं। माता-पिता के साथ खेतों में जाया करते थे तबसे किसानी में रुचि थी। वे यहां 37 वैराइटी की उपज लेकर पहुंचे हैं जिसमें फल, सब्जी शामिल हैं। एक खास चीज है सनाई जिसे हरी खाद कहा जाता है। जमीन की उर्वराशक्ति बढ़ाने में इसका अहम रोल होता है। उनके पास मिलेट की कई वैराइटीज है जैसे रागी, मडिय़ा, कोदो और कुटकी। भगवान भरोसे बिना सिंचाई के कहीं भी उगने वाली फसल मिलेट कहलती है जो काफी पौष्टिक होती है। चंद्रप्रकाश जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। विज्ञान परिषद प्रयागराज, विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी नई दिल्ली, यूपी गवर्नमेंट और पीपीवीएफआरए (पौधा किस्मा और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण) से सम्मानित किया जा चुका है।
छत्तीसगढ़ में अंगूर की खेती पर आज होगी बात
इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई)दिल्ली से आए डॉ एमके वर्मा मंगलवार को अंगूर की खेती पर अपनी बात रखेंगे। वे ग्रेप की वैराइटियों पर काम कर रहे हैं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, वेस्ट यूपी और हिमचाल प्रदेश में अंगूर उत्पादन के डेवलपमेंट पर इनकी भूमिका रहती है। उन्होंने बताया कि पूसा सीड लैस और पूसा अद्वितीय वैराइटी हाई ट्रेंप्रेचर ओर लो ट्रेंप्रेचर पर लगाए जा सकते हैं। अगर छत्तीसगढ़ की आबोहवा ऐसी है, यहां एक्सपेरिमेंट हुए हों तो अंगूर की खेती की जा सकती है। इन्हीं सब बातों पर आज मंथन किया जाएगा।
Published on:
21 Jan 2020 01:01 am
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