
‘तंत्र’ के सुवारथ ले ‘जन’ ल बचाय बर नइ उठत हे आवाज
मितान! गुलाम ले अजाद, परतंत्र ले स्वतंत्र, राज ले स्वराज अउ वोकर ले आगू बढक़र जनतंत्र। कास, हमरमन तीर अपन अजादी बर कुछु अउ सब्द होतिस। ए तीनोंठिन सब्द ल हमन अपन संग अइसन चिपका ले हंन के अब कुछु अउ नइ सुझय। आजो हमन ल ए अजादी ह कभु गुलाम रहे ले सुरता देवात रहिथे। ऐला अइसन समझो के हमन पानी म अभु घलो बूड़े हावन अउ मुड़ी ह सिरिफ बाहिर निकले हे।
सिरतोन! एकर से मना नइ करे जा सकय के, गुलामी के दुख-पीरा ह कतकोन पीढ़ी तक नइ भुलावंय। कतको तख्त बदल जाए, ताज बदल जाए, एक ले सेक राज चलइया आ-चल दंय, फेर गुलाम रहे के सुरता, घानी के बइला कर बछरों-बछर फंदाय रहे गे पीरा ह रहि-रहि के जनावत रहिथे। अइसे लागथे के आजो हमन गुलाम कस हावन। वोइसने दुख-पीरा साहत हंन। बस, राज करइयामन बदलत जावत हें, बाकी तो वोइसने चले आवत हे। कोनो ह ए गोड़ ल तोड़त हें, त कोनो ह वो गोड़ ल।
मितान! राजा-महाराजा, अंगरेजमन के राज चलदिस, फेर वोकरेमन कस राज चलत आजो जनता ल जनाथें। अजाद भारत म जमीदारी परथा नइए, फेर पद, पइसा अउ पावर के घमंड म चूर कतकोन लोगनमन जमींदारमन कस बेवहार, अतलंग अउ अतियार करे बर नइ छोड़त हें। समाज म जात-पात, छुआछूत, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के भेद-भाव चलतेच हे। कानून ल ठेंगा देखइयामन के कमी नइए।
सिरतोन! हमन सिरिफ सासन, राजा, साहेब बदले हंन, वोकरमन से अलग नइ होय अंन। गुलाम कस आजो वोकरमन के पिछलग्गू बने हंन। जी-हुजुरी करत हंन। वोकरमन के अंगरी के इसारा म नाचत हंन। राज चलइयामन हमन ल ‘गुलाम’ समझत हें, फेर हमन ‘करांतिकारीमन’ कस अवाज नइ उठावत हंन।
मितान! हमरमन के आदत पहिली अइसन नइ रिहिस। 15 अगस्त 1947 अउ 26 जनवरी 1950 के बाद हमन बिगड़त चलत गेंन। अजाद होगेन कहिके अपन जुझारूपन ल छोड़ देन, सरकार डहर ले आंखी मूंद लेन। संविधान बन गे, अपन कानून लागू होके सोचके निसफिकर होगेंन। कानून के रखवालामन ऊपर बिसवास करके अपन जिम्मेदारी डहर ले मुंह मोड़ लेन। देस के अजादी ल सब अपन-अपन अजादी समझे बर धर लेन।
जब आज पद, पइसा अउ पावर के बोलबाला हे। सुवारथ अउ लालच के जमाना हे। राजनीति अउ धरम के घालमेल होवत हे। राजनीति के अपराधीकरन होवत हे। अपराधी अउ पइसावालेमन जनपरतिनिधि चुने जावत हे। जनता दुवारा, जनता बर, जनता के राज म जनता ह सबले जादा दुख-पीरा सहत हे। खरा ऊपर खोटामन राज करत हें। जनतंत्र म तंत्र ह जन ले बड़े होगे हे। तभो ले ए हालात ले उबरे बर कहुं- कुछु अवाज नइ उठत हे, त अउ का-कहिबे।
Published on:
08 Jan 2024 03:46 pm
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