जनसंघ और जनता पार्टी के जमाने में भाजपा का गढ़ रहे राजगढ़ जिले में 90 के दशक के अंत में राजनीतिक हवा को बदल गई। पड़ोसी जिले गुना की राघौगढ़ सीट से जीतकर प्रदेश की राजनीति के सिरमौर बने दिग्विजय सिंह ने राजगढ़ जिले में कांग्रेस के सत्ता सूत्र अपने हाथ में लिए।
राजगढ़ जिले में एक रोचक चुनावी वाकया हुआ। पूर्व सोसायटी डायरेक्टर भंवरलाल चौहान ने पत्रिका को बताया—
जनसंघ और जनता पार्टी के जमाने में भाजपा का गढ़ रहे राजगढ़ जिले में 90 के दशक के अंत में राजनीतिक हवा को बदल गई। पड़ोसी जिले गुना की राघौगढ़ सीट से जीतकर प्रदेश की राजनीति के सिरमौर बने दिग्विजय सिंह ने राजगढ़ जिले में कांग्रेस के सत्ता सूत्र अपने हाथ में लिए। एक समय ऐसा भी आया, जब जिले की पांचों विधानसभा सीट कांग्रेस के कब्जे में रही।
यह बात 1998 के चुनाव की है। जब कांग्रेस ने राजगढ़, ब्यावरा, नरसिंहगढ़, सारंगपुर सहित खिलचीपुर की विधानसभा सीटों पर एक साथ कब्जा किया। उस समय राजगढ़ से प्रताप मंडलोई, ब्यावरा से बलराम गुर्जर, नरसिंहगढ़ से धूल सिंह यादव, सारंगपुर से कृष्ण मोहन मालवीय और खिलचीपुर से हजारीलाल दांगी चुनाव जीते। पूरा माहौल कांग्रेसमय था। दिग्विजय सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद साल 2003 में जब टिकट का वितरण हुआ तो पांचों के टिकट काट दिए। नतीजे में सिर्फ खिलचीपुर को छोड़कर सभी सीटों पर कांग्रेस हार गई। राजगढ़ जिला जो कांग्रेस का गढ़ बन गया था, वह अब भाजपामय हो गया। प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार भी बनी। इस चुनाव के बाद राजगढ़ को एक मंत्री भी बद्रीलाल यादव के रूप में मिला, वे ब्यावरा सीट से चुनाव जीते थे।
जो कांग्रेस में थे वे चेहरे अब भाजपा में
जो चेहरे पहले कांग्रेस के साथ नजर आते थे, वे अब भाजपा में दिखते हैं। 1998 में खिलचीपुर से हजारीलाल दांगी कांग्रेस से जीते थे। लेकिन अब भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। प्रताप मंडलोई जो राजगढ़ से चुनाव जीते थे, वे अब भाजपा में हैं। जबकि धूल सिंह यादव और बलराम गुर्जर फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर हैं। सारंगपुर के कृष्णमोहन मालवीय जरूर अभी भी कांग्रेस का दामन थामे हुए हैं।