राजसमंद

आज भी पापा की कोई चीज टटोलते हैं तो आंखों में तैर जाता उनका मुस्कुराता चेहरा

पुलवामा की बरसी की पूर्व संध्या पर पत्रिका टीम पहुंची बिनोल के शहीद नारायणलाल गुर्जर के घर, शहीद को वीरांगना व बेटे-बेटी हर पल करते हैं याद, ग्रामीणों व परिवारजन को स्मारक नहीं बनने का है दर्द

2 min read
आज भी पापा की कोई चीज टटोलते हैं तो आंखों में तैर जाता उनका मुस्कुराता चेहरा

कुंवारिया. जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में दो वर्ष पूर्व हुए आतंकी हमले में शहीद हुए बिनोल के लाल नारायणलाल गुर्जर 'काकाÓ को याद करते ही घर परिवार के सदस्यों की आंखों से आंसू छलक जाते हैं। क्षेत्र के ग्रामीण व शहीद के मित्र हर पल उन्हें यादों के झरोखों में आज भी संझोए हुए हैं। वीरागंना मोहनी देवी गुर्जर, पुत्री हेमलता गुर्जर, पुत्र मुकेश गुर्जर घर के मुखिया के देशसेवा में दी गई शहादत पर गर्व की अनुभूति तो करते हैं, मगर परन्तु उनकी कमी भी जिन्दगी में खल रही है।

पत्रिका टीम जब पुलवामा हमले की बरसी की पूर्व संध्या पर शहीद के घर पहुंची तो शहीद पिता को याद करते हुए पुत्र व पुत्री की आंखों से बरबस आंसू छलक आए। उन्होंने कहा कि वे भी आगे चलकर पापा के जैसे ही देशसेवा में जाएंगे। परिवारजन जब शहीद गुर्जर के कपड़े सहित बाकी ऐसी सभी चीजों को आज भी सम्भाले हुए है, जो वे इस्तेमाल करते थे। जब भी इन चीजों को देखते हैं, पापा से जुड़ी पुरानी यादों को वे ताजा कर लेते हैं। बच्चे बताते हैं कि पापा के कपड़े व अन्य वस्तुएं हाथों में आ जाती है कभी-कभी तो एकदम से पापा का मुस्कुराता चेहरा आंखों के सामने तैर जाता है

अनुशासन को लेकर सख्त थे 'काका'
दोनों बच्चों ने बताया कि पापा के नियम और अनुशासन काफी अधिक कड़े थे। हरपल देश की बातें करते थे। पापा जब भी छुटिट्यों में गांव आते थे तो युवाओं को सेना व अर्धसैनिक बल में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते रहते थे। गांव में जब तक रहते, अलसुबह गांव के खेल मैदान पर युवाओं को सेना भर्ती की तैयारियां करवाते थे। पुत्री हेमलता गुर्जर कक्षा 11 व पुत्र मुकेश गुर्जर कक्षा 9वीं में उदयपुर स्थित एक स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।

लोग करते हैं याद
'काकाÓ युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत थे। जब भी छुटिट्यों में बिनोल आते तो युवाओं को सेना में भर्ती के लिए प्रेरित करते थे। बचपन के मित्र शैतान सिंह, ललित बाफना, मुरली चोरडिय़ा, भैरूलाल सेन बताते हैं कि काका युवाओं को दौडऩे, कसरत करने व एकाग्र होकर अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते थे। वह बिनोल गांव
के युवाओं के दिल की धड़कन थे।

दो वर्ष बाद भी नहीं बना स्मारक
शहीद नारायणलाल के परिजनों ने बताया कि उनको इस बात का दुख है कि दो वर्ष पूर्व प्रशासन ने घोषणा की थी कि बिनोल में शहीद की स्मृति में स्मारक बनाया जाएगा, जिसके लिए भूमि आवंटन भी किया गया था, लेकिन अब तक स्मारक नहीं बन पाया। शहीद के मुकेश पुत्र व हेमलता ने बताया कि गांव में स्मारक बनता तो पूरे गांव के लिए यह गौरव का विषय होता।

तब उमड़ा था जज्बातों का ज्वार
दो वर्ष पूर्व पुलवामा में आतंकी हमले में शहीद हुए बिनोल के नारायणलाल गुर्जर के शहादत की जैसे ही गांव में सूचना मिली थी, उस समय पूरे गांव सहित क्षेत्रभर में शोक छा गया था। ग्रामीणों ने बताया कि जैसे ही बिनोल का लाल तिरंगे में लिपटकर गांव पहुंचा, हर एक इंसान रो पड़ा था। देशभक्ति को सलाम करने का वह नजारा अद्भुत था। गुर्जर के बचपन के मित्र शैतान सिंह ने बताया कि राजसमंद जिले ही नहीं, दूर-दूर से लोग शहीद के अंतिम दर्शन व श्रद्धांजलि अर्पित करने आए थे। वह पल अविस्मरणीय था। शिक्षाविद चतुर्भुज गुर्जर ने बताया कि जिस प्रकार हर व्यक्ति चार-पांच किमी तक पैदल चलकर अंतिम दर्शन व श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचा था, वह देशप्रेम व शहादत के सम्मान का अद्भुत नजारा था।

Published on:
14 Feb 2021 01:25 pm
Also Read
View All

अगली खबर